Blog: जलवायु परिवर्तन पर बात करना सिर्फ बच्चों और औरतों का काम नहीं

बाबा नागार्जुन जिसे ‘सावनी घटाओं के अविराम हमले’ कहा करते थे, उस बारिश से बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक परेशान है. जिन प्राकृतिक घटनाओं का आप कभी आनंद उठाया करते थे, अब सहन योग्य नहीं रहीं. और दुनिया भर में इसे लेकर चिंता जाहिर की जा रही है. नन्हे मुन्ने बच्चे झंडा उठाए स्कूल से छुट्टी लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. ग्रेटा थनबर्ग के एक भाषण ने सब बदलकर रख दिया है मानो. 16 साल की ग्रेटा ने संयुक्त राष्ट्र के एक कार्यक्रम में विश्व के नेताओं से नाराजगी से भरकर कहा था- आपने हमारा बचपन हमसे छीन लिया है. आपकी इतनी जुर्रत!! वह ट्रंप जैसे शक्तिशाली नेता को आग-बबूला होकर घूरती रही. वह इस बात से गुस्साई रही कि जलवायु परिवर्तन पर सिर्फ कोरी बातें क्यों की जाती हैं?


जैसा कि अंतरराष्ट्रीय मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) का कहना है कि इस सदी के अंत तक पृथ्वी का औसत तापमान दो डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा. महासागरों का औसत स्तर एक मीटर अधिक हो जाएगा. इन परिवर्तनों से आने वाली पीढ़ियों की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित होगी. इसीलिए ग्रेटा से लेकर दुनिया भर के बच्चे परेशान हैं. बड़ों से कह रहे हैं कि उन्हें सही रास्ता खोजना होगा.


मनुष्य और प्रकृति का साथ बहुत पुराना है. अज्ञेय ने कहा था कि मनुष्य हर चीज़ को अपनी शक्ल में ढाल लेना चाहता है. प्रकृति के साथ भी उसने ऐसा ही किया है. वह यही सोचता है कि प्रकृति का पूरा आयोजन उसी के लिए है. पर प्रकृति मनुष्य निरपेक्ष है. मनुष्य के भविष्य में उसकी कोई रुचि नहीं. अब जाकर उसका नशा टूटा जान पड़ता है लेकिन उसके पीछे भी स्वार्थ है. उसे लगने लगा है कि पृथ्वी अब चुक रही है और उसका अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है.

तो बच्चे परेशान हैं. इस परेशानी ने उनके भीतर एक किस्म की एन्जाइटी या व्यग्रता पैदा की है. ग्रेटा के नाराज चेहरे में अगर किसी को यह एन्जाइटी नजर नहीं आती तो वह नासमझ है. एन्जाइटी एक किस्म का भय है जो हम तब महसूस करते हैं जब खतरा तत्काल या घातक नहीं होता. हां किसी अप्रिय घटना के घटने की आशंका होती है. भय और एन्जाइटी किसी ऐसी खतरनाक स्थिति को लेकर हो सकते हैं जोकि अनियंत्रक और अप्रत्याशित हैं. जलवायु परिवर्तन का भय अनियंत्रक भय है. जिसे कोई नियंत्रित नहीं कर पाएगा. मेलबर्न विश्वविद्यालय में ग्रांट ए ब्लाश्की और सूजी बर्के जैसे मनोविश्लेशषकों ने अपने रिसर्च पेपर ‘क्लाइमेट चेंज एंड द प्रमोशन ऑफ मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग’ में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी व्यग्रता को युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बताया है. यह व्यग्रता ठीक वैसी है जैसी पिछले दशक में बच्चों को परमाणु युद्ध को लेकर थी. हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के स्कॉलर विलियम आर. बियर्डस्ली ने इस पर पूरा शोध किया था.


ग्रेटा या दूसरे बच्चों की व्यग्रता समझी जा सकती है. लेकिन ऐसे कितने ही लोग हैं जोकि इन बच्चों की नासमझी पर हंस रहे हैं. ग्रेटा का मजाक उड़ाने वाले बहुत से हैं. सोशल मीडिया पर उसे लेकर कई खराब कमेंट्स किए गए. पौरुष से भरे- नन्ही बच्ची को नादान बताने वाले. अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रंप के एक स्टाफर ने उसे टीनएज पपेट कह दिया. ब्रेग्जिट के एक एक्टिविस्ट ने कहा कि काश, उसकी नाव पलट जाती है तो ब्रिटेन के एक दक्षिणपंथी नेता ने उसे अभिमानी और ढीठ लड़की कहा. जैसा कि अक्सर होता है, आप टिप्पणी बर्दाश्त न करें, तो व्यक्ति को ट्रोल करने लगें. स्त्री होने पर यह और आसान हो जाता है. ग्रेटा को भी अभद्रता का सामना करना पड़ा. यह इत्तेफाक ही है कि इससे पहले अमेरिका की मशहूर नेता एलेक्जांड्रिया-ओकासियो कोर्टेज और कनाडा की सांसद कैथरीन मेक्केना ने जलवायु परिवर्तन पर अपने विचारों पर सेक्सिएस्ट कमेंट सहे हैं. कैथरीन को क्लाइमेट बार्बी कहा गया और एलेक्जांड्रिया को ट्विटर पर कई बार लताड़ खानी पड़ी.


ऐसी टिप्पणियों को लेकर 2014 में स्वीडन में एक पेपर पब्लिश किया गया था- इंटरनेशनल जनरल फॉर मैस्कुनिलिटी स्टडीज. इसमें माना गया था कि जलवायु परिवर्तन को समर्थकों से वे लोग नफरत भरी बातें करते हें जिन्हें पुरुषों के वर्चस्व वाले आधुनिक औद्योगिक समाज पर खतरा नजर आता है. यहां की चालमर्स यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी ने क्लाइमेट डिनायलिज्म (मतलब जलवायु परिवर्तन से इनकार करने) पर अध्ययन करने के लिए पहला रिसर्च सेंटर बनाया. इसने क्लाइमेट डिनायर्स यानी जलवायु परिवर्तन से इनकार करने वाले लोगों और एंटी फेमिनिस्ट लोगों, दोनों के बीच गहरे रिश्ते का पता लगाया. 2017 में साइंटिफिक अमेरिका के एक आर्टिकल में रिसर्चर्स ने कहा कि पुरुष खुद को इको-फ्रेंडली मानने से कतराते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसा करने से उन्हें फेमिनिन माना जाएगा. 2019 में रिसर्च गेट पर छपी एक स्टडी में दस देशों के 83% पुरुषों ने माना था कि अगर वे कपड़े, जूट वगैरह के थैले लेकर शॉपिंग करने जाते हैं तो उनकी हेट्रोसेक्सुअल छवि पर धब्बा लगता है. बेशक, इन लोगों ने भारत के प्रधानमंत्री का सिंगल यूज प्लास्टिक पर कोई भाषण नहीं सुना है.


नन्हे मुन्ने बच्चों की चिंता जायज है. मनुष्य प्रकृति की सोहबत में समय गुजारने के वक्त इंसानी समाज की याद में उसे गंदला करता रहता है. प्रकृति को प्रकृति की तरह देखना आसान नहीं है. यह हम सबके लिए एक चुनौती ही है. अगर हम समय रहते नहीं चेते तो वर्ग संघर्ष के समाप्त होने के बाद हमारा अंतिम युद्ध प्रकृति से ही होगा.


(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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