शनिदेव की दयालुता के लिए इन बातों पर जोर दें, बनेंगे बिगड़े काम

शनिदेव ग्रहों में न्यायाधीश हैं. उनकी दयालुता बिगड़े कार्य बनाती है. शनिदेव की प्रसन्नता के लिए खानपान, बातचीत एवं व्यवहार पर जोर देना आवश्यक है.

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ढाई साल में एक राशि और एक माह में एक अंश की यात्रा करने वाले शनिदेव की गति अत्यंत प्रभावी है. उनकी गति का ही प्रभाव है कि वे एक स्थान और वस्तु पर गहरा असर छोड़ पाते हैं.

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राजा हरिश्चंद्र को शनिदेव की परीक्षा में स्वप्न में ही सबकुछ छोड़ देना पड़ा था. साथ ही राजा हरिश्चंद्र की सच्चरित्रता और श्रद्धा-भक्ति ने उन्हें अमर बना दिया. शनिदेव की कृपा से हरिश्चंद्र भारत के ऐतिहासिक पुरुषों में अग्रणियों में हैं.

सर्वप्रथम बात करें खानपान की शनिदेव सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय की भावना के प्रेरक हैं. आपके आसपास जबतक एक भी भूखा है और आपसे भोजन की अपेक्षा रखता है तो व्यक्ति की यह जिम्मेदारी है कि उसे अपने हिस्से का आखिरी निवाला भी खुशी से उसे प्रदान करे. याचकों, मेहमानों और वरिष्ठों के भोजन लेने के बाद ही व्यक्ति अन्न ग्रहण करे.

वाणी में सदा प्रिय और सद्वचन रखे. किसी के प्रति वाणी की कठोरता भी शनिदेव के कोप को बढ़ा सकती है. शनिदेव छोटे लोगों के प्रति सम्मान की अपेक्षा लोगों से रखते हैं. बड़ों को लगभग सभी सम्मान देते हैं. मीठा व्यवहार रखते हैं. श्रेष्ठ व्यक्ति छोटों से भी यथायोग्य सम्मान जनक प्रियवचन बोलते हैं. उनके सहयोगी बनते हैं.

व्यवहार में व्यक्ति को सदा सकारात्मक और समता को बनाए रखने वाला होना चाहिए. भेद और नकारात्मकता शनिदेव को अप्रसन्न करती है. लोगों की कमियां निकालना और उनसे उूच नीच का प्रदर्शन करना शनिदेव को रुष्ट करता है. ढैया और साढ़ेसाती में ऐसे व्यवहार को पूर्णतः त्याग देना चाहिए. अन्यथा शनिदेव का कोप कई गुना हो जाता है.

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