Magh Purnima: किस शुभ मुहूर्त में करें स्नान? जानें क्या हैं इसके महत्व

वैसे तो पूर्णिमा हर महीने के आखिरी में पड़ती है लेकिन माघ महीने की आखिरी पूर्णिमा को माघी पूर्णिमा कहा जाता है. साल भर में जितनी भी पूर्णिमा होती हैं उनमें माघी पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है.

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माघ पूर्णिमा का हिंदू धर्म के अनुसार खास महत्व होता है. इसके महत्त्व का उल्लेख पौराणिक ग्रन्थों में मिलता है. पुराणों की कथा के अनुसार इस खास दिन देवता अपना रूप बदलकर गंगा स्नान के लिए प्रयागराज आते हैं. जो श्रद्धालु प्रयागराज में एक महीने तक कल्पवास करते हैं उसका समापन माघ पूर्णिमा के दिन ही होता है. कल्पवास करने वाले सभी श्रद्धालु माघ पूर्णिमा पर मां गंगा की पूजा-अर्चना कर साधू, संतों और ब्राह्मणों को आदर से भोजन कराते हैं.

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मान्यता है कि माघ पूर्णिमा के दिन गंगा में स्नान करने से शरीर के रोग दूर होते जाते हैं,और गंगा स्नान से सारे पाप धुल जाते हैं. इसी वजह से माघी पूर्णिमा पर गंगा स्नान के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है. वहीं इस दिन दान देने का विशेष महत्व होता है. इस बार माघ पूर्णिमा 27 फरवरी को पड़ रही है.

किसे कहते हैं माघी पूर्णिमा:

माघ महीने की आखिरी पूर्णिमा को माघी पूर्णिमा कहा जाता है और इसके अगले दिन से ही फाल्गुन की शुरुआत हो जाती है. साल भर में जितनी भी पूर्णिमा होती हैं उनमें माघी पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है. शास्त्रों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि इस दिन विधि विधान से पूजा करने और दान आदि करने से मनुष्य को पुण्य की प्राप्ति होती है.

माघ पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त :

माघ पूर्णिमा की शुरूआत 26 फरवरी को शुक्रवार की शाम 03 बजकर 49 मिनट से होगी और 27 फरवरी शनिवार दोपहर 01 बजकर 46 मिनट तक के बाद समाप्त हो जायेगी.

माघ पूर्णिमा का महत्व:

हम सब जानते हैं कि पूर्णिमा पर पवित्र नदी में स्नान करने और दान-पुण्य का बहुत महत्व होता है. वहीं पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस दिन श्री हरि विष्णु और हनुमान जी की पूजा करने से व्यक्ति को सभी सुखों की प्राप्ति होती है. साथ ही सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. इस दिन जो व्यक्ति व्रत करता है वो चंद्रमा की पूजा भी करता है. ज्योतिष के अनुसार, इस दिन चंद्रमा की पूजा करने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है.

माघी पूर्णिमा से हुई थी कलयुग की शुरुआत:

माना जाता है कि इस दिन से ही कलयुग की भी शुरुआत हुई थी. महीने भर से चल रहा कल्पवास भी इसी दिन संपन्न होता है. पूरे माघ में श्रद्धालु नदी के तट पर कल्पवास और तप करते हैं. इस दिन चंद्रमा देवता भी अपनी सोलह कलाओं से शोभायमान होते हैं.

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