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संगीत की लता...बेदर्द जमाने के कुछ निजी दर्द

त 26 साल पुरानी है. बीएचयू में एक लड़की को गाते हुए सुना तो मन में सवाल आया कि क्या लता मंगेशकर इससे अच्छा गाती होंगी. इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने के लिए एक दोस्त का टेपरिकॉर्डर ले आया. लता जी के गीतों के कैसेट खरीदे. कुछ कैसेट दोस्तों से मांगकर ले आया. जैसे जैसे लता को सुनता गया, वैसे वैसे लगा जैसे जीवन के ना जाने कितने रंग उनके गीतों के पहलू में समाए हुए हैं. उसमें किसी को देखकर खुशियों से चहकने का भाव है. किसी को खोने पर सब कुछ खो देने की पीड़ा है. कहीं मिलन की आशा है. कहीं बिरह का दर्द है. कहीं प्यारी सी मुस्कान है. कहीं बेबसी के आंसू हैं. ये तमन्ना थी कि एक दिन लता जी से मिलने जाऊंगा लेकिन जिस तरह रावण आज आज करते करते स्वर्ग तक सीढ़ी नहीं बना पाया, मैं भी आज-आज करते हुए आज अपनी अधूरी तमन्ना के साथ खड़ा हूं.

देखा जाए तो लता जी की जिंदगी भी अधूरी तमन्नाओं की मुकम्मल कहानी है. हम सब उनको स्वर की देवी के रूप में याद करते हैं. उन्हें सरस्वती का रूप मानते हैं. हमने उनको देवी बना दिया लेकिन एक इंसान के रूप में उनकी चाहतों की एक छोटी मगर प्यारी सी दुनिया भी रही होगी, इसके बारे में जमाने ने कभी सोचने की जहमत ही नहीं उठायी. हम अपनी खुशियों के शोर में किसी की दर्द भरी टीस का एहसास कर नहीं पाते हैं. हमने शुरु से एक ऐसा समाज गढ़ा जिसने इंसान को कोल्हू का बैल बना दिया. आज के संदर्भ में कहें तो हाड़-मांस का मशीन बना दिया. ये समाज समझने को तैयार ही नहीं होता कि उसकी रूखी परंपराओं की तुलना में इंसानों की छोटी छोटी खुशियां बहुत ज्यादा बड़ी होती हैं और ज्यादा मायने रखती हैं.

लता जी और राज सिंह डुंगरपुर में प्यार भरा भावनात्मक रिश्ता रहा. कहते हैं कि दोनों शादी करना चाहते थे लेकिन राज राजघराने से आते थे और लता सामान्य परिवार से. राज की बहनों और परिवार वालों ने टांग अड़ा दी कि राजपरिवार की जीवनशैली को लता क्या जानती होंगी. कुल-खानदान की परंपराओं, संस्कारों और झूठी शान ने राज और लता को मिलने नहीं दिया. दोनों ताउम्र दोस्त बने रहे लेकिन कोई कसक तो रही होगी जो आखिरी दम तक चुभती रही होगी.

जिंदगी ऐसी ही कसक और काश के साथ चलती है. फिर आदमी अपने लिए उससे बाहर निकलने और जिंदगी को बेहतर बनाने का रास्ता ढूंढ़ लेता है. अपनी शादी के बारे में लता जी ने कहा था कि - "मेरे पिता ने मेरी जन्मपत्री पढ़ी थी और कहा था कि मैं अकल्पनीय रूप से मशहूर होऊँगी, पूरे परिवार को देखूँगी और शादी नहीं करूँगी. यही जीवन है. जन्म, मरण और शादी पर किसी को कोई ज़ोर नहीं होता. अगर मैंने शादी की होती तो मेरी ज़िंदगी अलग होती. मैं कभी अकेलापन महसूस नहीं करती. मैं हमेशा परिवार के साथ रही हूँ." किसी को चाहना और उसे पा लेना एक सपना होता है लेकिन हर सपना मधुर वास्तविकता बने, ये आवश्यक नहीं है. कई बार कुछ सपनों की त्रासद मौत हो जाती है. लेकिन कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है. जीवन जितना निर्मल और मुलायम होता है, उतना ही कठोर और हर थपेड़ों को झेल जाने वाला भी होता है.

लता के गीत एक तरफ लोगों को रुमानियत की अद्भुत दुनिया में ले जाते हैं तो दूसरी तरफ दिलों पर दर्द की वो दस्तक देते हैं जो दर्द बार-बार अपना पता पूछते हैं. क्या पता उन गीतों की खुशियों में उनकी आरजू बोलते हों और ये भी क्या पता कि उनके गीतों के दर्द में उनका दर्द भी बोलता हो. हीर रांझा का वो गीत याद कीजिए- 'दो दिल टूटे दो दिल हारे', या फिर प्रेम रोग का वो बोल कि 'मेरी दुनिया उदास है आ जा'. इतनी रंगीन दुनिया में भी इंसान की जिंदगी, उसकी निजी दुनिया कई बार उदास रह जाती है ना! उस उदासी से निकलने के लिए इंसान इतिहास के माथे पर अपने व्यक्तित्व और हुनर से हस्ताक्षर कर देता है. लता जी ने वही किया. उन्होंने संगीत को साधा और हिंदुस्तानी संगीत उनकी उंगली पकड़कर पूरी दुनिया की सैर कर आया. आज दुनिया में हिंदुस्तानी संगीत का एक बड़ा हिस्सा उनके गीतों में गूंजता है. उन्होंने एक भरी-पूरी जिंदगी जी. कायदे से उनके शरीर छोड़ देने पर दुखी नहीं होना चाहिए. फिर भी मन दुखी होता है. अब मन का क्या कीजिएगा, वो सुनता कहां है.

जिसके लिए मन में जीवन भर श्रद्धा रही, उसको अब श्रद्धांजलि कैसे दी जाए, ये समझना मुश्किल हो जाता है. 1996 में मैंने उनपर कुछ लिखा था, शायद वही श्रद्धांजलि हो.

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