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उस बदले हुये पंडाल में बदले हुये शिवराज...

पंडाल में कई सारी गोल टेबलों के चारों ओर लगी कुर्सियों पर पत्रकार हंसते मुस्कुराते नव वर्ष की शुभकामनाओं के आदान प्रदान में व्यस्त थे.

तकरीबन एक साल के अंतराल के बाद भोपाल के हम सारे पत्रकार इस पंडाल में एक बार फिर मिल रहे थे. भोपाल के श्यामला हिल्स के मुख्यमंत्री निवास में ये नये साल का स्नेह मिलन था, जिसमें मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल के पत्रकारों को बुलाया था. पंडाल में कई सारी गोल टेबलों के चारों ओर लगी कुर्सियों पर पत्रकार हंसते मुस्कुराते नव वर्ष की शुभकामनाओं के आदान प्रदान में व्यस्त थे. मुख्यमंत्री तब तक आये नहीं थे और मेरी नजरें पंडाल के चारों तरफ दौड रहीं थीं. पंडाल में चौतरफा रौनक थी मगर एक कोना सन्नाटे में था और वो कोना था उस ओर जहां पर मंच था. मंच पर पर्दा डाल कर ढक दिया गया था. मगर मेरा मन तो पर्दे के पीछे की नौ महीने पुरानी कहानी में ही उलझा हुआ था. मुख्यमंत्री निवास के बाहरी तरफ लगे उस पंडाल के उस मंच पर पिछले कुछ सालों में हमने अनेक आयोजन देखे थे. जिनमें अलग अलग समाज की पंचायतों से लेकर सम्मान समारोह और मटकी फोड़ के कार्यक्रम इसी मंच पर हुये हैं. मगर मंच का पिछला आयोजन मेरी आंखों से हट नहीं पा रहा था ना जाने क्यों. शायद इसलिये कि उसे हुये अभी सिर्फ पूरे दस महीने भी नहीं हुये.

साल दो हजार बीस का वो 20 मार्च का दिन था. जब सुबह दस बजे हम यहां भागे भागे आये थे. इसी पंडाल में कुर्सियां लगी थीं, जिसमें एक ओर कांग्रेस के विधायक तो दूसरी और हम पत्रकारों के बैठने की व्यवस्था की गयी थी. पंडाल के मंच पर बड़ा सा फ्लेक्स लगा था जिस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के फोटो के साथ लिखा था तरक्की रंग लायी उम्मीदें मुस्कुरायीं. मगर उस दिन किसी के चेहरे पर दूर दूर तक मुस्कुराहट नहीं थी, सिवाय हम पत्रकारों को छोड़ कर जो उन दिनों रोज हर घड़ी मिल रही खबरों से उत्साहित थे.

काम करते करते सुबह से देर रात भले ही हो रही हो मगर खबरें हमें आनंदित करतीं हैं ना जाने क्यों और वो भी बडी खबरें आह क्या बात है. उस पंडाल में हम जिस बड़ी खबर की आस में दौड़े दौड़े आये थे वो खबर थोडी देर बाद आ ही गयी. मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पत्रकार और अपने विधायकों के सामने बताया कि वो इस्तीफा देने जा रहे हैं, बस फिर क्या था पंद्रह साल की पुरानी बीजेपी सरकार को हटाकर आयी पंद्रह महीने पुरानी कांग्रेस की सरकार धराशायी हो गयी थी. सरकार क्यों गिरी और अब क्या होगा इस विषय पर हम पत्रकार उस पंडाल में अपने अपने संस्थानों को लाइव चैट और अपडेट कराने में लग गये. पंडाल के मंच पर सन्नाटा छा गया था. आप शायद नहीं जानते हम पत्रकार बेहद निष्ठुर और वीतरागी होते हैं, वो भी टीवी के हों तो निर्मम भी लिख सकते हैं. किसी भी बडे आदमी के चेहरे पर माइक लगाकर ही पूछते हैं बताइये कैसा लग रहा है. तो कैसा लग रहा है सवाल वहां आये विधायकों और कांग्रेस के नेताओ से लगातार हम टीवी के पत्रकारों की ओर से पूछा जा रहा था.

खैर कांग्रेस सरकार के गिरते ही बीजेपी की सत्ता में वापसी की सरगर्मियां राज्य में शुरू हो गयीं थीं. मगर एक बडी खबर और उस पंडाल में पक रही थी जिसकी जानकारी हमें कुछ दिन बाद मिली. हमारे एक साथी पत्रकार की बेटी लंदन से पढाई कर घर लौटी थी और वो पत्रकार मित्र भी उस पंडाल में हुये पत्रकार सम्मेलन में आये हुये थे. कुछ दिन बाद ही भोपाल की पहली कोरोना पाजिटिव फैमिली पिता पुत्री कोरोना पाजिटिव आये ओर संकट आया हम पंडाल में मौजूद बाकी पत्रकारों पर. कुछ के घर पुलिस तो कहीं प्रशासन पहुंचा घरों में हमें क्वारंटीन करने.

तो मजा ये देखिये कि नये मुख्यमंत्री की मेजबानी में हुये इस स्नेह सम्मेलन में वो पत्रकार साथी भी आये हुये थे और मित्रों से मिलकर पुरानी यादों को ताजा कर हंस रहे थे. ये बात जब हमने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को बतायी कि नौ महीने पहले इस पंडाल में आये थे तो साल की सबसे बडी खबर और कोरोना की आशंका लेकर गये थे, और उसके बाद अब आये हैं इस पंडाल में. ऐसे में ठहाका लगाकर शिवराज बोले मैं गारंटी लेता हूं कि इस बार आप कोरोना लेकर नहीं जायेगे. इसलिये बेफिक्र रहें और मिठाई खाइये. ऐसे में हमने पूछ ही लिया कि आप इतनी मिठाई खिलाते हो, स्वयं भी मीठा खाने में परहेज नहीं करते फिर इन दिनों आपके भाषण तीखे क्यों हो गये हैं. जमीन में गाड दूंगा, छोडूंगा नहीं, उल्टा लटका दूंगा, ऐसा क्यों आपने मिठाई खानी कम कर दी क्या. इस जलेबी जैसे सवाल पर भी शिवराज ने सामने टेबल पर रखे गाजर के हलवे जैसा मीठा जबाव दिया. देखो मेरा तो एक सूत्र है सज्जनों के लिये फूल सा कोमल और दुष्टों के लिये वज्र सा कठोर यही मेरा राजधर्म है. प्रदेश से माफिया को भगाना है और भ्रष्टाचारियों को छोडना नहीं है. इसलिये इन बयानों से जिसको डर लगता है वो डरें और हम कह ही नहीं रहे कर भी रहे हैं. इसके बाद वो माफिया के खिलाफ किये गये अपनी सरकार के काम गिनाने लगे.

आप बदल गये हैं ये वो सवाल था जो हर थोडी देर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस पंडाल में देना पड़ रहा था, जिसका जबाव वो अपनी चिर परिचित मुस्कुराहट और कभी कभी ठहाकों के साथ दे रहे थे. इस बदलाव पर किसी को आपत्ति नहीं थी. क्योंकि सच में वक्त तेजी से बदल रहा है, ऐसे में मुख्यमंत्री अपनी कार्यशैली में बदलाव कर रहे हैं तो आश्चर्य नहीं करना चाहिये. हम तो यही कहेंगे कि इस बदलाव में आप अपना मूल चरित्र ना बदलें मुख्यमंत्री जी जिसने आपको देश के इस हदय प्रदेश का सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाला मुख्यमंत्री बनाया है.

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