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COVID-19: मुंबई की लोकल ट्रेन कब चलेंगी? कैसे चलेंगी?

सवाल उठता है कि आगे चलकर अगर ढील दी भी जाती है तो मुंबई की लोकल ट्रेनों का क्या होगा. लोकल ट्रेनें ही मुंबई को रफ्तार देतीं हैं. क्या लोकल ट्रेनें फिर पटरी पर पहले की तरह दौडेंगीं.? क्या उनमें फिर पहले की तरह भीड होगी?

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई इन दिनों भारत की कोरोना कैपिटल भी बनी हुई है. 17 मई के बाद हो सकता है कि देश के कुछ इलाकों में लॉकडाउन शिथिल हो जाये लेकिन मुंबई की हालत को देखते हुए फिलहाल वहां ऐसी कोई गुंजाइश नजर नहीं आती. ऐसे में सवाल उठता है कि आगे चलकर अगर ढील दी भी जाती है तो मुंबई की लोकल ट्रेनों का क्या होगा. लोकल ट्रेनें ही मुंबई को रफ्तार देतीं हैं. क्या लोकल ट्रेनें फिर पटरी पर पहले की तरह दौडेंगीं.? क्या उनमें फिर पहले की तरह भीड होगी?

भारत की अर्थव्यवस्था से मुंबई की लोकल ट्रेनों का सीधा कनेक्शन है. मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है. अगर लोकल ट्रेनें चलेंगी तो मुंबई चलेगी और मुंबई चलेगी तो देश की अर्थव्यवस्था चलेगी लेकिन लॉकडाउन की वजह से मुंबई की लोकल ट्रेनें बंद पड़ी हुई हैं और अब एक बड़ा सवाल ये है कि आखिर ये लोकल ट्रेनें है फिर एक बार कब शुरू होगी और क्या बिना इन लोकल ट्रेनों के मुंबई को चलाया जा सकता है?

महाराष्ट्र कोरोना से प्रभावित आज सबसे बडा राज्य बन गया है और महाराष्ट्र में भी कोरोना के मरीज सबसे ज्यादा मुंबई में हैं. कोरोना से मरने वालों की तादाद भी सबसे ज्यादा इसी शहर में है और मुंबई देश की कोरोना कैपिटल बन गई है. यहां कोरोना मरीजों की तादाद और भी कई गुना ज्यादा हो सकती थी अगर सरकार ने मार्च के तीसरे हफ्ते में लोकल ट्रेनों का संचालन न बंद किया होता.

भारत की पहली रेल 16 अप्रैल 1853 को मुंबई के बोरीबंदर रेलवे स्टेशन (आज का सीएसएमटी) से थाने तक चली थी जिसने 34 किलोमीटर का फासला तय किया था. बहुत जल्दी रेलगाड़ी मुंबई के विकास में, इसके फैलाव में एक अहम भूमिका निभाने लगी और आज मुंबई की लोकल ट्रेन इस शहर की लाइफ लाइन मानी जाती हैं.

मुंबई एक तेज रफ्तार से भागता दौडता शहर है और इस शहर को रफ्तार देतीं हैं लोकल ट्रेनें. दूर उपनगरों में रहने वाले लोग हर सुबह लोकल ट्रेनों में दबकर, पिसकर, लटकर दक्षिण मुंबई की तरफ अपने कामकाज के ठिकानों के लिये रोजगार जुटाने के लिये निकलते हैं. शाम को यही लोग अपने अपने घरों तक पहुंचने के लिये संघर्ष करते हैं. अबसे डेढ़ महीने पहले तक सुबह शाम मुंबई के रेल स्टेशनों पर देखी जाने वाली भीड़ यही बयां करतीं है कि लोकल ट्रेन किस तरह से मुंबई वालों की जिंदगी का हिस्सा बन चुकीं है. दक्षिण मुंबई में मौजूद बीएसई, बडे बैंक के दफ्तर, मल्टीनेशनल कंपनियों के मुख्यालय, हाई कोर्ट, मंत्रालय, स्कूल-कॉलेज, पांच सितारा होटेल में काम करने वाले ज्यादातर लोग इन्ही लोकल ट्रेनों के जरिये घर और दफ्तर के बीच का फासला तय करते हैं....लेकिन फिलहाल कोरोना ने पूरी तस्वीर बदल कर रख दी है.

मुंबई के सबसे बड़े रेलवे स्टेशन पर बंद पड़ी लोकल ट्रेनें बंद पड़ी मुंबई की तस्दीक करती हैं. रोजाना सुबह और शाम के वक्त इन तमाम प्लेटफॉर्म पर लाखों लोगों की भीड़ होती है और प्लेटफार्म पर कदम रखने की जगह नहीं होती लेकिन आज इतना बड़ा स्टेशन जो हमेशा गुलजार रहा करता है सुनसान पड़ा है. इस सीएसएमटी स्टेशन पर 18 प्लेटफॉर्म हैं जिनमें 7 प्लेटफॉर्म सिर्फ लोकल ट्रेनों की खातिर हैं. ये स्टेशन दुनिया के सबसे व्यस्त स्टेशनों में गिना जाता है और रोजाना साढे 6 लाख मुसाफिर यहां से गुजरते हैं.

मुंबई में ढाई हजार लोकल ट्रेन रोजाना चलाई जाती हैं जिनमें की प्रतिदिन 7500000 मुसाफिर रोजाना सफर करते हैं. मुंबई लोकल ट्रेनों का नेटवर्क करीब 390 किलोमीटर लंबा है. मुख्यतः तीन प्रमुख लाइने है लोकल ट्रेनों की. सेंट्रल रेल्वे की एक मेन लाइन है जो कर्जत-कसारा तक जाती है. हार्बर लाइन है जो नवी मुंबई के पनवेल तक जाती है और तीसरी लाइन वेस्टर्न रेलवे की है जो चर्चगेट से शुरू होकर डहाणू तक जाती है. बढती आबादी के साथ लोकल ट्रेनों का नेटवर्क भी लगातार फैल रहा है. एक ओर जहां सेंट्रल रेलवे की मेन लाईन पुणे के करीब खोपोली तक जा रही है तो वहीं दूसरी ओर हार्बर लाईन भी जेएपीटी बंदरगाह से सटे उरण तक पहुंचने वाली है.

चाहे 26 जुलाई 2005 की प्रलंयकारी बारिश हो या फिर 26 नंवबर 2008 का आतंकी हमला मुंबई की लोकल ट्रेनें चंद घंटों बाद ही फिर एक बार पटरी पर लौट आईँ. मुंबई अपने इतिहास में तमाम हादसे झेल चुके है और हर हादसे के बाद ये लोकल ट्रेनें ही हैं जो कि शहर को फिरसे एक बार पटरी पर लाने में मदद करतीं हैं, हादसे से उबारती हैं, जनजीवन सामान्य करतीं हैं.

लोकल ट्रेन मुंबई की लाइफलाइन भले ही हों लेकिन अपनी भीड़ और भीड़ की वजह से होने वाले हादसों के कारण बदनाम भी हैं. हर साल इन लोकल ट्रेनों की भीड़ से गिरकर हजारों लोगों की मौत होती है. कई लोग घायल हो जाते हैं लेकिन जिस तरह से इस शहर की आबादी बढ़ रही है उसी के साथ-साथ लोकल ट्रेन के मुसाफिरों की संख्या भी लगातार बढ़ती ही जा रही है. मुंबई में कई नए आने वाले लोगों के लिए लोकल ट्रेन में चढ़ना या उससे उतर पाना एक टेढ़ी खीर होता है, एक संघर्ष होता है. कल ट्रेन में होने वाली यही भीड कोरोना वायरस को लेकर भी खतरनाक है. लोकल ट्रेनों का मामला इतना संवेदनशील है कि रेल विभाग इसे जल्द शुरू करने के पक्ष में नजर नहीं आ रहा.

अब सवाल ये उठता है कि कब तक यह लोकल ट्रेनें ऐसे ही बंद पड़ी रहेंगी. क्या लॉक डाउन के बाद इन्हें शुरू किया जाएगा और अगर किया जाएगा तो फिर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन इन भीड़ भरी लोकल ट्रेनों में कैसे होगा. कहीं लोकल ट्रेन वायरस का कैरियर तो नहीं बन जाएंगी. इसके लिए किस तरह की उपाय योजना की जा रही है.

रेल मामलों के जानकार अनिल तिवारी ने लोकल ट्रेनों को फिर शुरू करने की दिशा में कुछ सुझाव दिये हैं. इनके मुताबिक लोकल ट्रेनों के स्टेशनों पर हवाई अड्डों की तरह सुरक्षा इंतजाम होने चाहिये. स्टेशन में घुसने वाले शख्स को स्क्रीन किया जाये. शुरूवात में कुछ विशेष ट्रेनें ही चलाईं जायें और उनमें भी चुनिंदा मुसाफिरों को ही सफर करने की इजाजत हो.

तमाम मुंबई वालों को लोकल ट्रेन को रोक रखने वाले लाल सिग्नल के हरा होने का इंतजार है लेकिन जिस तरह के हालात मुंबई के बने हुए हैं, जिस तरह से लगातार करुणा पॉजिटिव मरीजों की संख्या बढ़ रही है उसे देखते हुए लगता नहीं कि हाल-फिलहाल में ये लाल सिग्नल हरा हो पाएगा और पटरियों पर लोकल ट्रेनों की गड़गड़ाहट फिर एक बार सुनी जा सकेगी.

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