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किसान तो एमपी का भी बैचेन है

दिल्ली के आंदोलन वाली जगह से सिहोर जिले का छापरी गांव अंदाजा लगाये तो पौने आठ सौ किलोमीटर दूर है. मगर यहां एक खेत की मेड पर हरी प्लास्टिक की चादर बिछाकर दस किसान बैठे हैं.

''आवाज देकर हमें तुम बुलाओ, मोहब्बत ना इतना ना हमको सताओ''

शानदार अदाकार शम्मी कपूर की फिल्म प्रोफेसर का ये सुपरहिट गाना है. गाने की इस तर्ज को याद रखिये और गुनगुनाइये.

''भले चाहे इंडिया को डिजिटल बनाओ, भले स्वच्छ भारत मिशन तुम चलाओ, मगर कुछ रहम हम किसानों पर खाओ, हम भी धरोहर हैं अपने वतन की, हमसे है शोभा तुम्हारे चमन की, भले छह हजार ना हमको डलाओ, भले आत्मनिर्भर ना तुम हमको बनाओ, मगर कुछ रहम हम किसानों पर खाओ, फसल का उचित दाम हमको दिलाओ, हमें कर्ज मुक्त अब तो कराओ.''

किसानों का दर्द बताने वाला ये गीत देवास जिले के एक छोटे से गांव के किसान ने लिखा है. ये किसान अपने आपको शिवराज सिंह और मोदी का भक्त भी बताता है. हमेशा वो मुझे अपने बनाये और गाये गीत भेजता है. कमलनाथ सरकार ने जब कर्ज माफी में देरी की तो उसके गाने को हमने अपने चैनल के घंटी बजाओ कार्यक्रम में चलाया और बाद में उसे बीजेपी ने झाबुआ में हुये अपने उपचुनाव में इस्तेमाल भी किया मगर किसान तो किसान ही होता है. हाल के किसान आंदोलन देख कर जब उसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो अपने खेत पर खटिया बिछायी मुंह पर शाल लपेटा और गा दिया ये गाना जिसे अब तक यूटयूब पर लाखों लोग देखकर सराह चुके हैं. हमने जब उसे अपने चैनल पर लाइव आकर गाने को कहा तो वह कह उठा सर हम भाजपा समर्थक किसान हैं खुलकर गायेंगे तो साथ वालों को परेशानी होगी आप तो इसे ही चला दीजिये मगर ये मेरी नहीं पूरे देश के किसान की पीडा है. हम दिल्ली तो जा नहीं सकते इसलिये अपने ही खेत पर गाकर दर्द कम कर लिया और आप जैसे लोग इसे चैनल पर दिखा देते हैं तो लगता है अपना दर्द बहुतों को सुना दिया. मगर भाईसाहब अपन किसान आंदोलन के साथ हैं आरदणाय मोदी जी से उम्मीद करते हैं हम किसानों की सुनेंगे और एमएसपी लागू करने का कानून बनायेंगे. किसानों का कानून कोई ऐसे बिना बहस के लाता है क्या कोई. यही नाराजगी हम सब किसानों की है.

दिल्ली के आंदोलन वाली जगह से सिहोर जिले का छापरी गांव अंदाजा लगाये तो पौने आठ सौ किलोमीटर दूर है. मगर यहां एक खेत की मेड पर हरी प्लास्टिक की चादर बिछाकर दस किसान बैठे हैं. एक किसान ढोलक तो दूसरा खंजरी रखें हैं और मगन हो कर गा रहे हैं.

''सुन लो देश के वासियों एक सच्ची बात बताते हैं, दुनिया में अत्याचार घने किसानों को समझाते हैं, पहले राजा होते थे अब नेता और व्यापारी हैं, किसानों की खा जाते हैं उनकी कीमत सारी है, कुछ तो नेता खाते हैं कुछ खाते व्यापारी हैं, मेहनत सबसे ज्यादा है वो कीमत कम पाते है, कम दामों में बीज को बाजार बेच कर आते हैं, अपने माल की वह तो कीमत नहीं लगा पाते हैं, महंगे बीज वह देते हैं महंगी दवाई देकर फसल को उगाते हैं, भारत तो आजाद हुआ किसान गुलामी सहते हैं, सुन लो देशवासियों एक सच्ची बात बताते हैं.''

किसानों के इस दर्द भरे गीत को गाने वाले लिखने वाले वीडियो बनाने हमारे एमएस मेवाडा हैं. जो अपने आपको किसान नेता नहीं समाजसेवी लिखते हैं. भोपाल और सिहोर के तकरीबन सारे पत्रकार उनको जानते हैं और किसानों से जुडा कोई भी मुददा हो किसानों की परेशानी हो धरने प्रदर्शन से लेकर गांव की अजब गजब कहानियां मीडिया तक पहुंचाते हैं और इस चक्कर में जिले के अफसरों की नाराजगी झेलते हैं तो फिर कहते हैं भाई साहब जरा बचा लीजिये जिले के अधिकारी आपकी खबर से बहुत नाराज हो गये हैं. किसानों की कर्ज माफी हुयी तो भोपाल के मंत्रालय के सामने जाकर किसानों का लोक नृत्य करवा दिया और जब शिवराज सरकार ने किसानों के खातों में दो किश्तों में चार हजार रुपये डालने की बात की तो उनसे व्यक्तिगत मिलकर शुक्रिया जता दिया. गांव में गुलाल उडाकर होली मना ली. अब जब दिल्ली में किसानों का ये आंदोलन चल रहा है तो इसी का अफसोस मना रहे हैं काश अपन दिल्ली जा पाते मगर कोरोना के डर से परिवार के लोग नहीं जाने दे रहे. तो क्या हुआ इतनी दूर बैठकर ही अपन उन किसानों के समर्थन में रोज किसी नये गांव मे जाते हैं और किसानों को खेत की मेड पर बिठाकर यही गाना गवाते हैं और राहत महसूस करते हैं. अभी जब हमने मेवाडा जी के हालचाल जानने फोन लगाया तो बोले मोदी जी से हाथ जोडकर निवेदन है कि साहब ठंड में ठिठरते किसानों पर रहम खाओ और किसानां की एमएसपी की मांग को मान लो देश भर के किसानों का नया जीवन मिल जाएगा. वरना अब तो खेती करना गुलामी हो गयी है और ये कानून लागू हो गये तो सच में बडे व्यापारियों की गुलामी करनी पड जाएगी हमें.

किसान आंदोलन भले ही दिल्ली की सडकों पर चल रहा हो मगर बैचेनी हर किसान के मन में है. दिल्ली भले ही नहीं जा पा रहे हों मगर किसानों का समर्थन दिल्ली घेर कर कडकती ठंड में लंगर खाकर डेरा डाले किसानों के साथ दिल से है. इन दो किसानों के किस्सा सुनाने का मकसद सिर्फ यही है कि जो कहते हैं कि नये कृषि कानूनां को लेकर पेट में दर्द पंजाब के किसानों को ही है बाकी के देश भर के किसान क्यों नहीं बोल रहे या आंदोलन कर रहे.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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