चुनाव, राजनीतिक दल और महिला सशक्तीकरण के साथ लैंगिक संवेदनशीलता का मसला

सबकुछ यथावत रहा तो 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव में कम से कम 179 संसदीय सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. 2024 के लोकसभा चुनाव से करीब छह महीने पहले सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक पारित कराया और इसे उचित ही महिला सशक्तीकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया. विपक्षी दल तो महिला आरक्षण को 2024 के लोकसभा चुनाव से ही लागू करने की मांग कर रहे थे, लेकिन सत्ता पक्ष ने परिसीमन में लगने वाले समय का हवाला देते हुए तय समय सीमा को उचित ठहराया. जिस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों सहमत हों, उसका देश में लागू होना तय है.
महिला आरक्षण और संसद
पीआरएस लेजिस्लेटिव के अनुसार 17वीं लोकसभा में करीब 15 प्रतिशत महिला सांसद थीं. वहीं पिछले साल राज्य सभा में करीब 13 प्रतिशत महिला सांसद थीं. यानी, महिला आरक्षण के लागू होने के बाद संसद और विधानसभा में महिलाओं की संख्या में दो गुना से ज्यादा की बढ़ोतरी होनी तय है. इसी हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने सर्वोच्च अदालत के अधिवक्ता संघ में दो पद महिलाओं के लिए आरक्षित करने के निर्देश दिये थे. कुछ राज्यों में पंचायत चुनाव में पहले से आरक्षण लागू है. कुछ दलों ने भी अपने स्तर पर एक निश्चित प्रतिशत में महिलाओं को टिकट दिया है. राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी का ग्राफ देखें तो लगता है कि भारतीय लोकतंत्र महिलाओं के लिए दिन प्रति दिन पहले से ज्यादा दोस्ताना होता जा रहा है, लेकिन यह तस्वीर का एक पहलू है. इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि महिला आरक्षण के समर्थक ज्यादातर राजनीतिक दलों का महिलाओं के साथ अपराध से जुड़े मामलों के प्रति नजरिया अंसवेदनशील प्रतीत होता है. अगर पिछले कुछ सालों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो ज्यादातर राजनीतिक दलों में वह 'नैतिक आधार' गायब दिखता है जिसके आधार पर किसी जमाने में राजनेता लाभ एवं प्रभाव के पदों से आरोपों की जांच पूरी होने तक इस्तीफा दे देते थे.
नैतिकता और राजनीतिक दल
ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल अपने विधायकों, सांसदों एवं पदाधिकारियों इत्यादि पर नैतिकता के आधार पर कार्रवाई करना लगभग भूल चुके हैं. जब तक घटना के अकाट्य प्रमाण या वीडियो या तस्वीरें न सामने आ जाएं तब तक ज्यादातर राजनीतिक दल ऐसी घटनाओं को नकारने में लगे रहते हैं. दुखद यह है कि जिन दलों में महिलाएँ प्रमुख पदों पर हैं, उनमें भी महिलाओं के संग होने वाले अपराध के प्रति समुचित संवेदनशीलता नहीं दिखती है. कई बार तो महिला नेता भी मर्दवादी भाषा में उल्टा पीड़ित महिलाओं पर ही आरोप मढ़ने लगती हैं. देश के नागरिक के तौर पर हम सबके लिए चिंता की बात यह है कि देश की आधी आबादी के प्रति ऐसा रवैया रखते हुए भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का सपना कैसे पूरा कर पाएगा? एक तरफ भारतीय महिलाएं खेलकूद से लेकर चन्द्र और मंगल मिशन में योगदान देने वाली प्रतिभा के तौर पर नाम कमा रही हैं, दूसरी तरफ सार्वजनिक जीवन में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में हमारा रिकॉर्ड अपेक्षित तेजी से नहीं सुधर रहा है. पिछड़े इलाकों में ही नहीं, महानगरों, प्रतिष्ठित संस्थाओं एवं राजनीतिक दलों और सरकारी दफ्तरों तक में महिलाओं के सुरक्षा सुनिश्चित से जुड़े शर्मनाक मामले सामने आते रहते हैं.
महिला सुरक्षा हो प्राथमिकता
अगर महिलाएं घर के अन्दर और बाहर सुरक्षित नहीं महसूस नहीं करेंगी तो उनको दिए तमाम तरह के प्रोत्साहन और आरक्षण अपना मकसद नहीं हासिल कर पाएंगे. ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि जिस तरह विभिन्न राजनीतिक दल सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विकास इत्यादि के मुद्दे पर एक दूसरे से होड़ करते हैं, उसी तरह उन्हें महिला सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर एक दूसरे से बेहतर माहौल देने की प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए. इसकी शुरुआत राजनीतिक दलों को खुद से करनी चाहिए ताकि उनके संगठन के अन्दर ऐसी घटनाएँ न हों और अगर किसी पदाधिकारी के खिलाफ कोई शिकायत आए तो उसपर कानून का डण्डा चलने से पहले अन्दरूनी जांच कर के नैतिक आधार पर कार्रवाी सुनिश्चित करें. क्या यह सम्भव नहीं है कि कम से कम कोई कुछ दल यह खुलकर कहें कि उनके दल के पदाधिकारी या नेता यदि महिलाओं के उत्पीड़न इत्यादि में शामिल पाए जाएंगे तो उनपर पार्टी स्वयमेव कार्रवाई करेगी. उस कृत्य की सीडी या क्लिप वायरल होने का इन्तजार नहीं करेगी, मामले में एफआईआर होने और आरोपपत्र दायर होने का इन्तजार नहीं करेगी. यदि राजीतिक दल ऐसे मामलों में अपने स्तर पर प्राथमिक जांच करके कार्रवाई नहीं करते हैं तो आमजन के मन में यही धारणा बनेगी कि मामला लीक न हो तो पार्टियों को महिला उत्पीड़न से कोई खास दिक्कत नहीं होती है.
वक्त की जरूरत है कि राजनीतिक दलों को लैंगिक संवेदशनलीता (जेंडर सेंसिटाइजेशन) को लेकर अपने पदाधिकारियों एवं नेताओं को प्रशिक्षण देने की मुहिम शुरू करनी चाहिए. सभी दलों को अपने कार्यकर्ताओं को जेंडर और कम्युनिटी इत्यादि की संवेदनशीलता को ध्यान रखने का प्रशिक्षण देना चाहिए ताकि वह महिला आरक्षण लागू होने के बाद बेहतर होने वाले जेंडर अनुपात के लिए तैयार रहें. इस तरह हम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ने के साथ ही, उनके लिए पहले से बेहतर और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित कर सकते हैं.
























