×

एक्सप्लोरर

कैसे लड़ें गांधी की स्मृतियों के हत्यारों से?

हिंदू राष्ट्रवाद का वर्तमान पुनरुत्थान 1980 के दशक के आखिरी वर्षों से नजर आता है, जब कुछ मुट्ठी भर लोग गोडसे के पक्ष में बोलने लगे थे लेकिन बीते सात वर्षों में वर्तमान हिंदू राष्ट्रवादी सरकार के सत्ता में आने के बाद ऐसे लोगों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा हुआ है.

भारत में गांधी की स्मृतियों की हत्या करने वाले आज हर जगह मौजूद हैं. वे भारत-भूमि के तमाम ऊंचे ओहदों पर विराजमान हैं, वे विधायिका की इमारतों में हैं, वे देश के राजमार्गों से लेकर छोटी-छोटी गलियों और सबसे ज्यादा तो उन मध्यमवर्गीय घरों में हैं जहां इस विश्वास की जड़ें जमा दी गई हैं कि देश-विभाजन के लिए गांधी ही जिम्मेदार थे. जहां उन्हें मुस्लिम पक्षधरता और तुष्टिकरण से जोड़ कर निंदा की जाती है. उन्हें आधुनिकता-विरोधी करार दिया जाता है. अहिंसा के सिद्धांतों की वकालत करने के लिए उनकी खिल्ली उड़ाई जाती है. राजनीति में पवित्रता बनाए रखने के उनके लक्ष्य की बात पर तंज कसे जाते हैं.

हर बरस की तरह इस साल भी दिन आ गया है, जब ‘राष्ट्रपिता’ को ठंडे बस्ते से निकाला जाए और उनके आदर-सम्मान के पाखंडपूर्ण आडंबर किए जाएं ताकि दुनिया देख सके कि इस देश में महापुरुषों-संतों-पैगंबरों का सम्मान किया जाता है. पूरा देश गांधी जी की हत्या के दिन, 30 जनवरी को उन्हें याद करता है. साल-दर-साल इस दिन देश को चलाने वाले शक्तिशाली राजनेता, आधिकारिक रूप से ‘शहीद दिवस’ पर दो मिनट का मौन रखते हैं. दया-करुणा की बातों के साथ ये विशिष्टजन राजघाट पर जाते हैं और इनके मुखारविंद से शांति तथा धर्म की अविस्मरणीय बातें झरती हैं. इसके तत्काल बाद सरकार अपने काम पर वापस लौट जाती है और विरोधियों का मुंह बंद करने तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जेल में डालने का काम शुरू कर देती है.

हजारों हजार साल पहले महाभारत में ‘अहिंसा परमो धर्मः’ की उद्घोषणा हुई थी मगर हाल के वर्षों में भारत में दो चौंकाने वाली समानांतर बातें हुई हैं. एक तरफ गांधी पर हमले बढ़े हैं और उसके बरक्स उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को पुनर्स्थापित करने की व्यावहारिक कोशिशें हुई हैं. सिर्फ दो हफ्ते पहले देश की राजधानी दिल्ली से 200 मील दक्षिण में स्थित ग्वालियर में हिंदू राष्ट्रवादियों की एक बड़ी भीड़ गोडसे ज्ञान शाला के उद्घाटन का जश्न मनाने के लिए इकट्ठा हुई. यहां एक पुस्तकालय बनाया गया, जिसमें नागरिकों को अब महान देशभक्त कहने वाले व्यक्ति के बारे में ‘ज्ञान’ देने की व्यवस्था थी. 1949 में फांसी पर लटकाए गए गोडसे का ऐसा महिमामंडन कुछ दशकों पहले तक मुख्य रूप से महाराष्ट्र के पुणे में चोरी-छुपे हुआ करता था, जहां उसका जन्म हुआ था. हत्यारे नाथूराम के भाई गोपाल गोडसे और विष्णु करकरे को गांधी की हत्या में षड्यंत्रकारी भूमिका निभाने के लिए आजीवन कारावास की सजा होने के बावजूद 1964 में रिहा कर दिया गया था. तब हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा उनके स्वागत में किए आयोजन में मात्र 200 लोगों ने हिस्सा लिया और नाथूराम गोडसे को ‘देश भक्त’ बताया गया. उन दिनों यह मुद्दा देश की संसद में उठा और इस पर काफी हंगामा हुआ था.

हिंदू राष्ट्रवाद का वर्तमान पुनरुत्थान 1980 के दशक के आखिरी वर्षों से नजर आता है, जब कुछ मुट्ठी भर लोग गोडसे के पक्ष में बोलने लगे थे लेकिन बीते सात वर्षों में वर्तमान हिंदू राष्ट्रवादी सरकार के सत्ता में आने के बाद ऐसे लोगों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा हुआ है. मई 2019 में हुए पिछले आम चुनाव में, आतंकवाद के आरोप में कई वर्ष जेल में बिता कर आई साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने खुल कर कहा, ‘नाथूराम गोडसे देश भक्त थे, हैं और रहेंगे.’ साध्वी भोपाल की संसदीय सीट से भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार थीं और वहां विजयी रहीं.

गांधी के हत्यारे का महिमामंडन भारत में क्रमशः राजनीतिक सफलता का प्रत्यक्ष पासपोर्ट बन गया है. कई लोग तर्क दे सकते हैं कि गोडसे को मानने वालों की संख्या बढ़ा-चढ़ा कर बताई जाती है. ग्वालियर में खुले पुस्तकालय का लोगों द्वारा ऐसा विरोध हुआ कि उसे दो दिन में बंद कर देना पड़ा. लेकिन इसके विपरीत स्थिति का प्रमाण भी आसानी से मिलता है. प्रज्ञा सिंह ठाकुर के ट्विटर पर दो लाख फैन फॉलोअर हैं, जो रातोंरात दस गुना बढ़ सकते हैं. सचाई यह है कि भाजपा नेतृत्व को महात्मा गांधी के राष्ट्रपिता होने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए प्रज्ञा सिंह ठाकुर के गोडसे को महान देश भक्त बताने वाले बयानों को सख्ती से खारिज करना चाहिए. इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि सोशल मीडिया पर हत्यारे से सहमत होने वाले बहुतेरे लोग हैं और उनकी संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है.

गोडसे-प्रशंसकों द्वारा किए जाने वाले हो-हल्ले से सहज अनुमान लगा पाना मुश्किल है कि गांधी के हत्यारे के पक्ष में पेंडुलम कितना आगे तक लहराया है. अभी तक वैचारिक महत्व की ठोस बात यही निकली है कि कम से कम आधुनिक इतिहास में गांधी जिस अहिंसा की बात करते थे, वह आम भारतीय के दैनिक शब्दकोश से धीरे-धीरे गुम होती जा रही है. अहिंसा अब भाषा, यहां तक कि बोलचाल में भी नहीं बची है. दुनिया में राज सत्ताएं हिंसा की बागडोर थामे रहती हैं लेकिन भारत में सर्वोच्च सत्ता ने समझ लिया कि वह सभ्य समाज के बड़े हिस्से में हिंसा को ‘आउटसोर्स’ कर सकती है. इसीलिए कई लोगों ने यह देखा-महसूस किया है कि भारत में खास तौर पर ट्रोल्स की भाषा गाली-गलौच भरी, अश्लील और खतरनाक ढंग से हिंसक है. उनकी भाषा ठीक उन गुंडों जैसी है, जो हर हाल में सड़क की हिंसा खत्म करने की ठेकेदारी करते हुए खुद लठैत बन जाते हैं. अहिंसा की इस भूमि की प्राण वायु अब हिंसक हो गई है.

अपने समय में ही गांधी के व्यक्तित्व ने वह ऊंचाई हासिल कर ली थी कि उनके सबसे करीबी सहयोगी और भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू विदेशियों से सहज कहते थेः इंडिया इज गांधी (गांधी ही हिंदुस्तान हैं). इसके पीछे विचार यह था कि भारत ने स्वतंत्रता मुख्य रूप से अपने अहिंसक प्रतिरोध से हासिल की थी और गांधी ने अपने दर्शन से कुछ ऐसा दिया था कि जिसे भारत अपनी उपलब्धि बताते हुए, दुनिया को उसका अनुसरण करने के लिए प्रेरित कर सकता था. अहिंसावादी विचारों को कमजोरी, स्त्रैण और अन्य सांसारिकताओं के त्रिकोण से मुक्त करके मजबूती से स्थापित करने के लिए गांधी को भी वीरों की तरह संघर्ष करना पड़ा. कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अपने अनुयायियों से पौरुष के पुनर्उत्थान का आह्वान करने वाला हिंदू राष्ट्रवाद संभवतः इस बात को लेकर पूरी तरह अति भावुक हो चुका है कि अहिंसा केवल कमजोरों का शस्त्र है.

बावजूद इसके हाल के वर्षों में जैसा देखने में आया है, गांधी की स्मृतियों की हत्या करने में लगे हुए लोगों को अभी बहुत श्रम करना होगा क्योंकि गांधी जगह-जगह बसे हैं. दिसंबर 2019 में, मुख्य रूप से कई बुजुर्ग और लगभग अशिक्षित महिलाएं एक अतिविशिष्ट आंदोलन में अहिंसक प्रतिरोध करती नजर आईं. कथित रूप से उन्हें अलग-थलग और उनके अधिकारों को शिथिल करने वाले नागरिकता संशोधन कानून समेत अनेक सरकारी अधिनियमों के विरुद्ध वे सत्ता के खिलाफ अहिंसा को शस्त्र बना कर डटी रहीं. दिल्ली के इस शाहीन बाग से प्रेरित होकर पूरे देश में दर्जनों शाहीन बाग अस्तित्व में आए. तीन महीने बाद कोरोना महामारी की आड़ में सरकार को इसे खत्म करने का बहाना मिला, जबकि यह आंदोलन उसके नियंत्रण से लगभग बाहर था. अहिंसा के साथ भारत के प्रयोगों का एक नया और दिलचस्प अध्याय अब किसान आंदोलन लिख रहा है. गांधी की स्मृतियों के हत्यारों को नाकाम बनाने का एक तरीका, उन्हीं के विचारों के अनुसार यह है कि अहिंसा के विचार को हमारे समय के अनुरूप ढाल कर नया रूप दिया जाए. इतिहास के वर्तमान मोड़ पर वाकई इससे बड़ा काम कोई और नहीं हो सकता.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

IPL

ABP Shorts

View More

Before You Go

Sponsored Links by Taboola

Live Tv

ABP न्यूज़
ABP Majha
ABP Asmita
ABP Sanjha
ABP Ananda
ABP Live
POWERED BY
sponsor
Hello Guest

व्यक्तिगत

टॉप स्टोरीज
रील्स
Fauzi Release Date: 'फौजी' का फर्स्ट लुक हुआ आउट, प्रभास का इंटेंस अवतार देख खड़े हो जाएंगे रोंगटे, जानें- कब रिलीज होगी ये फिल्म?
Fauzi Release Date: 'फौजी' का फर्स्ट लुक हुआ आउट, प्रभास का इंटेंस अवतार देख खड़े हो जाएंगे रोंगटे, जानें- कब रिलीज होगी ये फिल्म?
Friday Theatre Clash: फ्राइडे को बड़े पर्दे पर होगा धमाकेदार क्लैश, 'द ओडिसी' से टकराएंगीं GDN समेत 6 फिल्में, चेक करें लिस्ट
Friday Theatre Clash: फ्राइडे को बड़े पर्दे पर होगा धमाकेदार क्लैश, 'द ओडिसी' से टकराएंगीं GDN समेत 6 फिल्में, चेक करें लिस्ट
Embed widget