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सिंधिया से शिवराज तक, कोरोना से बचना मुश्किल

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फिर वही लॉकडाउन, फिर वही बेकारी और बीमारी. पहला दृष्य भोपाल में छह नंबर मार्केट में यदि बाईं तरफ से प्रवेष करें तो घुसते ही नीचे फुटपाथ पर चादर बिछाकर उस पर लाल रेशमी राखियां रखकर, धूप से बचने के लिए लाल छाता लगाकर बैठे कमल किशोर का है.

पढ़ा लिखा होने का सबूत आंखों में चश्मा और हाथ में पेन तो था ही, जानलेवा कोरोना से बचने के लिए मास्क की जगर सफेल रूमाल था. एक दिन बाद लगने वाले लॉकडाउन की आहट ने उनकी राखी की बिक्री की संभावनाएं खत्म कर दीं थी जिसकी चिंता की रेखाएं माथें पर थीं.

सुंदर सा विजुअल देख मोबाइल से दो फोटो खींची और कमल किशोर से झुक कर बात करने लगा. कहानी कुछ यूं थी कि पिछले लॉकडाउन में एनवीडीए दफ्तर से बाहर कर कमल किशोर बेरोजगार कर दिये गये थे. इसलिए इन दिनों परिवार पालने के लिए छोटे-मोटे काम कर रहे थे. राखी का त्यौहार आता देख हजार रुपये उधार लिये और राखियां खरीद कर कमाई के इरादे से बैठे ही थे कि लाकडाउन रिटर्न का आदेश आ गया. दुखी होकर किशोर कहने लगे कि पहले लॉकडाउन ने बेरोजगार बनाया तो दूसरे लॉकडाउन ने कर्जदार. पढे लिखे गरीब आदमी का जीना ही मुश्किल है इस कोरोना काल में.

दूसरा दृष्य भरत जाटव और उनके भाई की है जो मुरैना के रहने वाले हैं. छह नंबर पर नूतन कॉलेज के सामने फुल्की गोलगप्पे का ठेला लगाते हैं. ये काम वो धौलपुर से सीखकर आये थे. जब कालेज चलता था तो सारी भीड़ इनके ठेले के आसपास रहती थी और भाइयों का फुल्की खिलाते हाथ नहीं रुकता था. मगर पिछले लॉकडाउन में गलियों में सब्जी बेचकर गुजारा किया था. लॉकडाउन रिटर्न के एक दिन पहले फिर सब्जी ठेले के साथ दिख गये.

मैंने हंस कर पूछा क्या हाल हैं तो कहा कि बस भाईसाहब अब फिर इसी सब्जी का सहारा है. कल से दस दिन तक यही काम करना है यदि सरकार बेचने दे तो वरना दस दिन बहुत होते हैं, बच्चों को खिलाना मुश्किल होगा.

तीसरा दृष्य लॉकडाउन के पहले दिन का है. खबर बनाने निकले हैं साथ में एक दूसरे चैनल के साथी भी हैं. नए और पुराने भोपाल को जोड़ने वाली जगह कमला पार्क पर खड़े हैं. वहीं भोपाल पुलिस के तेज तर्रार युवा अफसर से मुलाकात होती है.

वे बताते हैं कि लॉ एंड ऑर्डर के साथ हमें भी व्यवहार निभाने पड़ते हैं. एक परिचित ड्राइवर का कल रात इंतकाल हो गया. पुराने शहर में रोज तीन चार मौतें बुजुर्गों की हो रही हैं. कोरोना की रिपोर्ट बाद में आती है पहले बुजुर्ग दम तोड़ देते हैं. ये बुजुर्गों पर कहर बनकर टूटा है. मगर इतने के बाद भी जनता समझने को तैयार नहीं है. जब तक पुलिस रहती है तो अंदर रहते हैं हमारे हटते ही फिर गली में उसी तरीके से उतर आते हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो. इस झुंझलाहट के साथ वो गिन्नौरी की संकरी सी गलियों में अपने परिचित के घर संवेदना जताने चले गये.

चौथा दृष्य कमला पार्क से न्यू मार्केट के रास्ते के बीच में ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का ट्वीट धमाके की तरह गिरता है. अपने को कोरोना पॉजिटिव होने की जानकारी उन्होंने स्वयं ट्वीट कर दी और ये खबर थोड़ी देर बाद ही सारे समाचार चैनलों पर सबसे बड़ी ब्रेकिंग न्यूज थी.

मैं और दूसरे चैनल के पत्रकार अपने-अपने चैनलों पर हो रहे फोनो के लिए और जानकारी जुटाने में लग गये. लोग ये खबर जानकर हैरान थे और जो ट्विटर पर नहीं थे वो हम सबसे व्हाट्एसएप के जरिए खबर सच है या नहीं ये जानने में लग गये थे. मगर खबर सच थी. प्रदेश के सबसे बड़े नेता को कोरोना ने संक्रमित कर दिया.

शिवराज सिंह चौहान की सक्रियता काबिले तारीफ है. वे अपने आप को हमेशा व्यस्त रखते हैं. सरकारी कामकाज हो या फिर पार्टी की जिम्मेदारी, किसी काम को वो मना नहीं करते और यही व्यस्तता उनको भारी पड़ी. दिन की चार सरकारी बैठकें और फिर पार्टी दफ्तर का एक चक्कर उनका रोज लगता ही था. थोड़ी देर बाद ही उनके चिरायु अस्पताल में जाते हुए विजुअल्स चैनलों पर चलने लगे और लोग उनके स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए शुभकामनाएं देने लगे.

दादा जब सिंधिया, अमिताभ और शिवराज भी कोरोना से नहीं बच पाए तो हमारा आपका और आम जनता का क्या होगा? ये अनुराग थे जो अब चिंतन के मोड में आ गये थे और उनके इस सवाल का मेरे पास कोई जबाव नहीं था. गिन्नौरी की संकरी गलियों के बुजुर्गों से लेकर श्यामला हिल्स के प्रदेश के सबसे सुरक्षित घर तक कोरोना की ये दस्तक अब वाकई डराने लगी है.

पुरानी महामारियों का इतिहास खंगाला जाए तो सबसे हाल की महामारी 1918 का स्पेनिश फ्लू थी जो पहले विश्व युद्ध के दौरान सैनिक कैंपों से फैली और सैनिकों के साथ ही उनके देशों में जाकर फैली. इस बीमारी के खिलाफ एक साल में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हुई तब जाकर ये खत्म हुई.

कोरोना कब तक रहेगा कहना मुश्किल है. बस उम्मीद की खबरें रोज अखबारों में वैक्सीन के टेस्टिंग को लेकर छपती हैं मगर वैक्सीन खोजना और उसे बड़े पैमाने पर बनाना कुछ महीनों की बात नहीं होती. लंबा वक्त लगता है. तब तक लॉकडाउन में जीना ही समाधान है. ये साल अपनी और अपने घरवालों की जान बचाने का साल है. ये हमेशा और हरदम याद रखना होगा.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है)

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