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बिहार चुनाव: विकास से दूर मिथिला को ऐसे नेता चाहिए जो मार्केट उपलब्ध कराए, नए स्टार्टअप, रोज़गार का अवसर खोले

यह तय करना होगा कि मिथिला और बिहार को सबसे ज्यादा जरूरत किस मुद्दे की है. प्रत्येक उम्मीदवार द्वारा प्रस्तावित कार्यक्रमों में हमारे कौन से हित संगत हैं?

नारे, नाम से जातीय पहचान, पार्टियों में परिवार का वर्चस्व और उम्मीदवार के बाहुबली व्यक्तित्व प्रायः सभी बिहारियों को चुनाव अभियान में अपना मत डालने के निर्णय को प्रभावित करता रहा है. वही हाल आज मिथिला में भी नजर आ रहा है. मुद्दों से ज्यादा, उम्मीदवार की जाति, परिवार और उसका बाहुबली व्यक्तित्व हावी हैं.

"बिहार में बेरोज़गारी", "आत्मनिर्भर बिहार," और "बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट" जैसे नारे इस वक़्त उम्मीदवारों द्वारा एक निश्चित छवि बनाने या एक राजनीतिक माहौल बनाने के लिए प्रयास किया जा रहा है. डिजिटल जीवन की तीव्रता और मास मीडिया पर हमारी निर्भरता ने हमारी राजनीतिक जानकारी प्राप्त करने के तरीके को बहुत बदल दिया है. यथार्थ से कहीं अधिक, शैली, आज के चुनावी अभियानों में भारी है. आज एक चुनावी अभियान एक छवि बदलने का अभियान मात्र है, और यहां तक की हर एक उम्मीदवार अपनी डिजिटल छवि को लेकर बहुत जागरूक हैं. जब छवि, राजनीतिक परिदृश्य पर हावी हो गई है, तो मुद्दों की जांच करना मतदाता के लिए उतना ही कठिन हो चुका है.

बीते कुछ सालों में खासकर जब से डिजिटल मीडिया सक्रिय हुआ है, तब से, कुछ पार्टियों ने अपने उम्मीदवार के चयन की प्रक्रिया बदलने की कोशिश जरूर की है. लेकिन आज भी टिकट बांटने की प्रक्रिया से पार्टी को बहुत अधिक फंड का लाभ होता है, इस कारण से जनता के पास विकल्प कम बचते हैं. यही हाल मिथिला के मतदाताओं का है.

1816 में सुगौली संधि के बाद, मिथिला की राजधानी जनकपुर के साथ-साथ मिथिला के कुछ अन्य क्षेत्रों को नेपाल में सौंप दिया गया था. इसका दूसरा विभाजन 1934 के बिहार-नेपाल भूकंप से हुआ, जिसमें एक ही भाषा, एक ही संस्कृति के लोगों के बीच रेल लिंक टूटने से हुआ था. हालांकि 86 साल के प्रतीक्षा के बाद, सितम्बर 2020 को फिर से कोसी नदी पर रेल मार्ग जोड़ा गया है.

देवी सीता की जन्मभूमि होने के कारण, इतिहास में मिथिला की राजधानी जनकपुर हिंदुओं के लिए वैसा ही स्थान रखती थी जैसा कि वेटिकन ईसाईयों के लिए, मक्का मुसलमानों के लिए है. आज मिथिलांचल बिहार का एक बहुत बड़ा हिस्सा है. हालांकि अफसोस की बात है कि मिथिला, बिहार में सबसे ज्यादा उपेक्षित रहा है. इस छेत्र के उपेक्षित रहने के कई कारण हैं, भौगोलिक, प्राक्रितिक, राजनैतिक, और यहां की जनता. इन सारे विषय पर चर्चा करना कठिन है. हालांकि बीते कुछ सालों में केंद्र सरकार की नजर मिथिला पर जरूर गयी है, जैसे मैथिली भाषा को लेकर, दरभंगा एयरपोर्ट, कुछ दशकों से AIIMS की घोषणा, इत्यादि. बीते शताब्दी में मिथिला का नकारात्मक विकास हुआ है ऐसे में छोटा बदलाव भी क्रन्तिकारी नजर आता है.

जब मिथिला में अपने नेता और उनकी दृष्टि से अनुपस्थिति दिखती है, तब यहां का विकास कोसो दूर तक नजर नहीं आता है. आज बच्चों की शिक्षा व्यवस्था डिजिटल हो रही है. गांव में शहर के जैसे इंटरनेट पहुंच चुका है. जब दूसरे राज्यों के स्कूल ऑनलाइन क्लास ले रही है, तो यहां के गांव के बच्चे इससे दूर क्यों हैं? जब शहरों में डॉक्टर अपने मरीज का ऑनलाइन कंसल्टेशन कर सकता है तो फिर क्यों आज भी मिथिलांचल के गांवों में लोगों को झोला छाप डॉक्टर पर ही निर्भर होना परता है. जब व्यापार ऑनलाइन है तो मिथिला का सामान वहां क्यों नहीं उपलब्ध है. जब देश-दुनिया का युवा मल्टीनेशनल कम्पनी में काम करना चाहता है, वहीं यहां का युवा वर्ग सरकारी नौकरी के वेकन्सी का इंतजार क्यों कर रहें हैं?

देश-दुनिया के युवा वर्ग कितने ही आविष्कार कर रहें हैं, कितने ही स्टार्टअप को वित्तीय सहायता मिल रही है. आज वही स्टार्टअप कितनों को रोज़गार का अवसर दे रहें हैं. यहां मिथिला के युवा वर्ग में बीएड की डिग्री लेने के लिए भीड़ लगी हुई है. लगता है हर किसी को सरकार के प्राथमिक स्कूल का शिक्षक ही बनना है, सरकारी बैंक में ही काम करना है. लाइफ को सेट करने वाले मानसिकता को बदलना है, तभी हमारे नेता भी बदलेंगे और उनके मुद्दे भी.

दशकों पहले शिक्षा और नौकरी करने परदेश जाना पड़ा था. अब चुनावी नारे हैं “नौकरी अपने ही राज्य में दूंगा”, “समान वेतन मिलेगा”, अब नौकरी करने के लिए दूसरे राज्य नहीं जाना होगा. कोरोना त्रासदी के कारण लॉकडाउन में पूरी दुनिया आज सबसे ज्यादा महत्व शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्वावलंबी को ही दे रहीं है. ऐसे में इस क्षेत्र की परिस्थिति तभी बदलेगी, जब यहां की जनता में क्षेत्र के विकास के प्रति जागरूकता आएगी. हमें जाति, धर्म, आपसी भेद-भाव और व्यक्तित्व को छोड़ ऐसे उम्मीदवार का चुनाव करना होगा, जो मिथिला को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करे. हमें बुद्धिमत्ता, ईमानदारी, संवाद करने की क्षमता के साथ-साथ ऐसे नेता की जरूरत है, जो हमें मार्केट उपलब्ध कराये और लघु उद्योग, कुटीर उद्योग, नयी शिक्षा नीति, कुछ नए स्टार्टअप स्थापित करने में मदद करे. कुछ नए रोज़गार का अवसर खोले.

जब हर सुबिधायें ऑनलाइन उपलब्ध हैं तो मिथिला इससे वंचित क्यों है? ऑनलाइन किसी भी राज्य या देश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अपने चीजों की मांग विदेशों में भी बढ़ा सकते हैं. जैसे मिथिला का मखाना, मिथिला पेंटिंग, मिथिला की कला, यहां की खादी, यहां का कृषि उत्पाद इत्यादि की मांग पूरे देश-दुनिया में ऑनलाइन माध्यम से बढ़ा सकते हैं. मिथिला को भी ऑनलाइन उपस्थिति बनाने की आवश्यकता है, चाहे वो शिक्षा, स्वास्थ्य या व्यापार ही क्यूं न हो.

हमें किसी भी चुनावी झांसे में न आकर, अपनी उपस्थिति पूर्ण तरीके से दर्ज करनी है. उन मुद्दों की जांच करें जो अपने क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं. यह तय करना होगा कि मिथिला और बिहार को सबसे ज्यादा जरूरत किस मुद्दे की है. प्रत्येक उम्मीदवार द्वारा प्रस्तावित कार्यक्रमों में हमारे कौन से हित संगत हैं? विकल्पों का वजन कर चुनाव करना आवश्यक है. मुद्दों को लेकर सभी पक्षों के विचार सुनना जरुरी है. क्योंकि जब आत्मनिर्भर होगा मिथिला तो खुशहाल होगा बिहार.

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(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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