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Opinion: खतरनाक रूप लेता कोचिंग उद्योग और अखाड़ा बनती कक्षाएं

2जून की रात पटना में कुछ बेहद परेशान करने वाला हुआ. करीब 15 से 20 लोगों की भीड़ खान ग्लोबल स्टडीज कोचिंग सेंटर पहुंची, पथराव किया, तोड़फोड़ की और चली गई. यह अपने आप में काफी चिंताजनक था. लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने मामले को और पेचीदा बना दिया. सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल होने लगा जिसमें दो लोग परिसर के पास हवाई फायरिंग करते दिख रहे थे. बाद में पता चला कि ये दोनों उसी संस्थान के सुरक्षाकर्मी थे. पटना पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया, हथियार जब्त किए और फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे. मामला दर्ज हुआ. फिर कुछ दिनों बाद पुलिस ने केजीएस के संस्थापक फैसल खान, जिन्हें लोग खान सर के नाम से जानते हैं, को भी इसी फायरिंग मामले में बुक कर लिया.

उनके वकील ने कहा कि वे कोर्ट में सरेंडर नहीं करेंगे और 8 जून को अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल करने की बात कही. प्रतिद्वंद्वी कोचिंग संस्थान ज्ञानबिंदु ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके दावा किया कि पूरा मामला नाटकीय था. उनके एक सदस्य आदर्श ने खान सर के गार्डों के फायरिंग वाले वीडियो की ओर इशारा करते हुए पूछा कि जब खुद खान सर की तरफ से गोलियां चलीं, तो उन्होंने यह कैसे कहा कि उन पर 7 से 8 राउंड फायरिंग हुई.

खान सर ने इसे साजिश करार दिया. उन्होंने कहा कि उन्हें इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वे बेहद कम फीस में पढ़ाते हैं और बेहतरीन नतीजे देते हैं. शुरुआती हमले के सिलसिले में ज्ञानबिंदु के डायरेक्टर सहित तीन लोगों को गिरफ्तार भी किया गया. राज्य सरकार ने इस बीच कहा कि वह जल्द ही बिहार में कोचिंग सेंटरों के बीच प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करने के लिए नीति लाएगी.

वह बड़ी समस्या जिस पर कोई बात नहीं करना चाहता

नाटकीयता, प्रेस कॉन्फ्रेंस और एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप को किनारे रख दें, तो जो तस्वीर उभरती है वह यह है कि पटना में कोचिंग उद्योग कितना खतरनाक मोड़ ले चुका है. पटना की कोचिंग पट्टी देश की सबसे प्रतिस्पर्धी जगहों में से एक है. बिहार और पड़ोसी राज्यों से हजारों छात्र हर साल सरकारी नौकरी, बैंक परीक्षा, यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए यहां आते हैं. छात्रों के लिए दांव बहुत ऊंचे हैं. कोचिंग संस्थानों के लिए भी उतने ही. यह बाजार सैकड़ों करोड़ का है, और सबसे आगे रहने, छात्रों को आकर्षित करने, सर्वश्रेष्ठ दिखने का दबाव हमेशा बना रहता है.

जब इस तरह का दबाव किसी अनियंत्रित जगह में जमा होता है, तो हालात बिगड़ते हैं. KGS वाली घटना पहली बार नहीं है जब पटना के कोचिंग सेंटरों में टकराव हुआ हो. शायद आखिरी भी नहीं होगी. लेकिन इस मामले को जो अलग बनाता है, वह यह है कि बात लाइसेंसी हथियारों तक पहुंच गई और गोलियां चलीं. इसके पीछे जो भी मकसद रहा हो, यह गंभीर बढ़ोतरी है.

असली कीमत कौन चुका रहा है?

जब यह सब अदालतों और प्रेस ब्रीफिंग में चल रहा है, तो एक और समूह है जो इस पूरी बातचीत में शायद ही आता है. वे छात्र.
इन संस्थानों में नामांकित हजारों युवा उन परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं जो उनकी जिंदगी बदल सकती हैं. वे उन परिवारों से आते हैं जिन्होंने अपनी बचत खर्च करके उन्हें पटना भेजा है. उनकी दिनचर्या, उनका आत्मविश्वास, उनकी सुरक्षा की भावना, सब कुछ इन कोचिंग संस्थानों के संचालन से जुड़ा है. जब हिंसा होती है, जब उनके शिक्षक आपराधिक मामलों के आरोपी बन जाते हैं, जब उनके आसपास का माहौल डरावना हो जाता है, तो छात्र इन सब को चुपचाप अपने अंदर समेट लेते हैं.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोई उनकी बात नहीं कर रहा था. राजनीतिक बयानों में कोई यह नहीं पूछ रहा था कि अगर कोचिंग सेंटर बीच सत्र में बंद हो जाए, या उसके आसपास का माहौल इतना तनावपूर्ण हो जाए कि पढ़ना मुश्किल हो जाए, तो छात्रों का क्या होगा.

जवाबदेही का अभाव

भारत में कोचिंग उद्योग लंबे समय से एक अनिश्चित क्षेत्र में काम करता रहा है. नियम हैं, लेकिन उनका पालन अनिश्चित है. संस्थान मनमानी फीस ले सकते हैं, सशस्त्र सुरक्षा रख सकते हैं, और आक्रामक विज्ञापन कर सकते हैं, बिना किसी खास परिणाम के. इसका नतीजा एक ऐसा बाजार है जो दिखावे, डर और आक्रामक प्रतिस्पर्धा पर चलता है.

बिहार सरकार का नीति बनाने का बयान सही दिशा में एक कदम है, लेकिन ऐसे वादों का रिकॉर्ड बहुत उत्साहजनक नहीं है. पिछले साल बीपीएससी परीक्षा के विरोध प्रदर्शनों में, जहां खान सर को खुद छात्रों के समर्थन में हिरासत में लिया गया था, यह दिखा कि बिहार के शिक्षा तंत्र में कुंठाएं कितनी गहरी हैं. वह भी बयानों पर खत्म हुआ, ढांचागत बदलाव नहीं हुए.

जरूरत सिर्फ एक नीति दस्तावेज की नहीं है, बल्कि एक ऐसे वास्तविक तंत्र की है जो कोचिंग संस्थानों को जवाबदेह बनाए, छात्रों को व्यावसायिक लड़ाइयों की चपेट में आने से बचाए, और यह सुनिश्चित करे कि कोई भी शिक्षक, चाहे वह कितना भी लोकप्रिय हो, खुद को संस्थागत जवाबदेही से ऊपर न माने.

खान सर ने अपनी पहचान सादगी से पढ़ाने वाले और कम फीस लेने वाले शिक्षक के रूप में बनाई थी. वह छवि अब सिर्फ एक कानूनी मामले से नहीं, बल्कि इस सवाल से भी दबाव में है कि किसी कोचिंग सेंटर को पहले स्थान पर सशस्त्र गार्ड की जरूरत क्यों पड़ती है. इस सवाल का जवाब बाकी सब से ज्यादा इस उद्योग की हालत बताता है.

2 जून को क्या हुआ, जांच आखिरकार यह तो बता देगी. लेकिन यह घटना पहले ही कुछ ऐसा उजागर कर चुकी है जो ध्यान देने योग्य है. पटना के कोचिंग बाजार में सबसे बड़ा नाम बनने की दौड़ में, शिक्षा और व्यापार के बीच की रेखा बुरी तरह धुंधली हो चुकी है. और छात्र, हमेशा की तरह, बीच में खड़े है.

नोट - (उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है)

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