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संसद में चर्चा से बना कानून तो सड़क पर बहस की चुनौती क्यों ?

नागरिकता कानून को लेकर विरोधियों की शंकाओं को दूर करने के लिए मोदी सरकार ने जनजागरण अभियान शुरु किया था... मोदी सरकार के दिग्गज मंत्रियों ने लोगों के घर-घर जाकर इस अभियान की सधी हुई शुरुआत की.. और अपनी रैलियों में सरकार, विपक्ष को नागरिकता कानून पर बहस की चुनौती दे रही है...

नागरिकता संशोधन कानून को बने हुए 41 दिन का वक्त बीत चुका है... लेकिन 41 दिन बाद भी नागरिकता कानून को लेकर देशभर में बहस और विरोध प्रदर्शन का दौर जारी है... मोदी सरकार शरणार्थियों को नागरिकता दिये जाने वाले इस कानून को लेकर अपने रुख पर कायम है... विपक्ष कानून वापस लेने की मांग पर अड़ा हुआ है... इसी गतिरोध का नतीजा है देश के अलग-अलग हिस्सों में सीएए के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन... लेकिन नागरिकता कानून पर चल रही ये कशमकश अब कानून को समझने और समझाने की बजाय... राजनीति के अपने पुराने और सबसे कारगर ढर्रे पर आ चुकी है... जिसमें असल मुद्दे की बजाय वार और पलटवार का सिलसिला चल रहा है...

नागरिकता कानून को लेकर विरोधियों की शंकाओं को दूर करने के लिए मोदी सरकार ने जनजागरण अभियान शुरु किया था... मोदी सरकार के दिग्गज मंत्रियों ने लोगों के घर-घर जाकर इस अभियान की सधी हुई शुरुआत की.. और अपनी रैलियों में सरकार, विपक्ष को नागरिकता कानून पर बहस की चुनौती दे रही है... गृहमंत्री अमित शाह ने अखिलेश यादव.. मायावती और ममता बनर्जी समेत विपक्ष के तमाम नेताओं को कानून पर बहस का करने को कहा था... और चौबीस घंटे बाद ही विपक्ष ने गृहमंत्री की चुनौती को स्वीकार कर लिया... आज नागरिकता कानून पर देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई की.. और विपक्ष की कानून पर रोक लगाने की मांग को ठुकरा दिया... लेकिन ये मोदी सरकार के लिए फौरी राहत नहीं है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट नागरिकता कानून के खिलाफ दायर हुई सभी याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है।

लोकतंत्र में संख्याबल एक सच्चाई है... और इसी संख्याबल की बदौलत.. मोदी सरकार ने संसद के दोनो सदनों से पास होने के बाद नागरिकता कानून बनाया.. इस संवैधानिक प्रक्रिया में सरकार और विपक्ष के तमाम नुमाइंदों के बीच लंबी चर्चा भी हुई... लेकिन अब इस कानून को लेकर सरकार और विपक्ष सड़कों पर बहस की बात कर रहे हैं.... लेकिन जिस कानून को लेकर ये पूरी राजनीतिक रार छिड़ी हुई है... जिस कानून के विरोध में बतौर वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में आज जिरह की.. उसी कानून को लेकर खुद कपिल सिब्बल कह चुके हैं, कि सीएए को रोकने की बात करने वाले राज्य कानून लागू होने से नहीं रोक सकते... क्योंकि ये असंवैधानिक कदम होगा...

राजनीति में आज इसी से जुड़े हमारे सवाल हैं कि 1 - जब संसद में चर्चा से नागरिकता कानून बना.. तो अब सड़क पर बहस की बात क्यों उठ रही है ? 2 - सवाल ये भी है कि क्या विरोध प्रदर्शनों के बीच असल मुद्दा पीछे छूट चुका है और अब इस मुद्दे पर सिर्फ सत्ता और विपक्ष के बीच वार-पलटवार हो रहा है? और सवाल ये भी है कि 3 - क्या 'देशद्रोही' और 'संविधान विरोधी' जैसे बयानों का असर हमारे सामाजिक ढांचे पर पड़ रहा है?

नागरिकता संशोधन कानून देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद से पारित हुआ था ऐसे में अगर कानून के किसी प्रावधान पर ऐतराज है, तो विपक्ष के पास विरोध के तमाम विकल्प मौजूद हैं। इनमें कानूनी विकल्प भी शामिल हैं और राजनीति विरोध प्रदर्शन भी, लेकिन ऐसे किसी भी विरोध में अराजकता की कोई जगह हो सकती। नागरिकता कानून की संवैधानिक वैधता का मामला वैसे भी अब सुप्रीम कोर्ट में है, इसलिये विरोध करने वालों को अब प्रदर्शन की बजाय सुप्रीम कोर्ट के फैसला इंतजार करना चाहिये। लेकिन बड़ी जिम्मेदारी सरकार की है जिसका जोर कानून को लेकर लोगों में बैठे डर को हटाने पर होना चाहिये, ना कि विपक्ष को बहस की चुनौती देने पर।

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