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कानूनी दांवपेंचों में गुनहगारों को हक, पीड़ित का हक कहां गया ?

सच ही तो है आरोपियों के हक, पीड़ितों के हक से बड़ा हो गया...यही तो परिवार का सवाल है...और ऊपर से जब सियासत उनके दुख को आरोपों और प्रत्यारोपों से और बढ़ाए...तो निराशा लाजमी है...

निर्भया के गुनहगारों की फांसी की तारीख बदल चुकी है....अब कोर्ट की तरफ से जो नया डेथ वारंट दिया गया है...उसमें एक फरवरी की सुबह 6 बजे चारों आरोपियों को फांसी देने की बात कही गई है....पहले ये तारीख 22 जनवरी तय की गई थी...जिसमें चारों आरोपियों को फांसी पर चढ़ाया जाना था....लेकिन चारों आरोपियों में से एक मुकेश ने अपनी दया याचिका के अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए अदालत में अर्जी दाखिल कर दी...जिस पर तिहाड़ प्रशासन से रिपोर्ट मांगी गई..इसके बाद ये पूरा मामला कानूनी दलीलों में झूलने लगा...मुकेश की दया याचिका तो राष्ट्रपति ने खारिज कर दी है...लेकिन बाकी तीन आरोपियों ने अभी भी दया याचिका नहीं लगाई है...ऐसे में माना जा रहा है कि अगर तीनों में से किसी एक ने भी याचिका लगाई....तो ये तारीख आगे बढ़ सकती है....क्योंकि आरोपी बचने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे...यही वजह है कि निर्भया के परिवार ने अपनी निराशा जताई है...और अपने अधिकारों के बाबत सवाल पूछा है...हालांकि ये सवाल उनका कोर्ट के बाहर मीडिया से है...जिसे सवाल नहीं पीड़ा मान लेना चाहिए....क्योंकि सात साल की लंबी लड़ाई के बाद जब उनकी बेटी को इंसाफ मिलने का वक्त आया है...तो आरोपियों को अपने अधिकार याद आ रहे हैं...हालांकि अधिकारियों की सियासत भी हो रही है...जिसमें केंद्र और राज्य सरकार के एक दूसरे पर आरोप भी सबके सामने है...लेकिन असल मुद्दा ये है कि आरोपियों को फांसी कब होगी....

सच ही तो है आरोपियों के हक, पीड़ितों के हक से बड़ा हो गया...यही तो परिवार का सवाल है...और ऊपर से जब सियासत उनके दुख को आरोपों और प्रत्यारोपों से और बढ़ाए...तो निराशा लाजमी है... निर्भया के परिवार का केस लड़ रहे वकील भी नई तारीख को लेकर आश्वस्त नहीं है कि इसी तारीख पर फांसी मुमकिन होगी...क्योंकि वो कानूनी अधिकारों को शायद समझ रहे हैं...और मान कर चल रहे हैं कि अभी इंतजार करना पड़ सकता है...

उधर दूसरी तरफ आरोपियों के वकील ने साफ तौर पर इशारा किया है कि वो अपने मुवक्किलों की फांसी को इतनी आसानी से मुकम्मल नहीं होने देंगे...फांसी और दोषियों के बीच कानून की दलीलों और तर्कों से उन्हें बचाने का हर मुमकिन रास्ता अख्तियार करेंगे.. उधर दूसरी तरफ आरोपियों की फांसी में हुई देरी को लेकर सियासत हुई तो भाजपा ने देरी के लिए आम आदमी पार्टी को जिम्मेदार बता दिया...केंद्रीय प्रकाश जावड़ेकर की मानें तो दिल्ली सरकार की सुस्ती के चलते...न्याय में देरी हुई... इन तमाम कानूनी पहलुओं के बीच एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि आखिर कैसे गुनहगार फांसी के फंदे से बार बार बच जा रहे हैं...और कौन सा वो हक है...जो उन्हें मौत के मुंहाने से खींच ला रहा है...

दया याचिका की तीनों अर्जी एक साथ या बारी-बारी लगाई जा सकती है। एक भी अर्जी पहुंचने की सूरत में फांसी की प्रक्रिया पर रोक लगेगी। जब तक चारों अर्जियों का पूरी तरह निपटारा नहीं होता तब तक फांसी नहीं। सियासत और कानून की बारीकियों को समझने के बाद कई सवाल उठते हैं...सबसे पहले तो यही कि निर्भया के दोषियों की फांसी की नई तारीख फाइनल है ? सवाल ये भी है कि कानूनी दांवपेंचों में गुनहगारों को हक देखा जा रहा है तो पीड़ित का हक कहां गया ? और सवाल ये भी कि एक दरिंदे के 'खेल' से बढ़ी तारीख, बाकी तीन नहीं बनेंगे इंसाफ में रोड़ा ?

कानून तो इंसाफ के लिए बना है, लेकिन कानून के कुछ रखवाले कानून की पेंचीदगियों को इस तरह से इस्तेमाल करते हैं कि वो इंसाफ की राह में रोड़ा बन जाता है...निर्भया के केस में यही हो रहा है...जरूरत है इस केस की भयावहता और पीड़ित परिवार की मनोदशा को समझने की...ताकि भविष्य में निर्भया के दोषी या ऐसे किसी भी मामले के दोषी कानून से आंख मिचौली न कर सके...

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