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प्रणब मुखर्जी: जरूरत से ज्यादा जानने वाला शख्स, जानिए- ग्रैंड ओल्ड पार्टी के साथ उतार-चढ़ाव भरे रिश्ते

इंडिया टुडे के संपादक एम जे अकबर को दिए एक इंटरव्यू में प्रणब मुखर्जी ने काफी पहले ही बता दिया था कि वह राहुल गांधी की सरपरस्ती में खुद को काम करते नहीं देखना चाहेंगे.

उस वक्त के केंद्रीय वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के प्रमुख संकटमोचक श्री मुखर्जी ने कहा था कि अगर तत्कालीन कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनते हैं, तो वह अगले केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होंगे. "हे भगवान! तब मेरी उम्र कितनी हो चुकी होगी? मैं पहले ही 75 बरस का हो चुका हूं. एक सीमा होती है, जिसे आप पार नहीं कर सकते. उल्टे मैं समय से ज्यादा विकेट पर टिका हुआ हूं.“- कहा था मुखर्जी साहब ने। उनको कांग्रेस के चार प्रधानमंत्रियों- इंदिरा, राजीव, पी वी नरसिम्हा राव और डॉ. मनमोहन सिंह के साथ काम करने का अनूठा गौरव हासिल था।

चार दशकों में फैले राजनीतिक जीवन के दौरान श्री मुखर्जी के गांधी परिवार से कुछ हद तक विचित्र किस्म के संबंध रहे। वह इंदिरा और संजय गांधी के लिए भरोसेमंद व हर मर्ज की दवा जैसे व्यक्ति रहे जबकि राजीव और सोनिया के साथ उनके संबंधों में कई उतार-चढ़ाव देखे गए।

रूपा पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित अपने संस्मरणों के दूसरे हिस्से “द टर्बुलेंट इयर्स” (1980-1996) में श्री मुखर्जी ने राजीव गांधी के बारे में बड़ी सावधानी से कई बारीक टिप्पणियां की हैं, जिनसे उनके सोनिया और राजीव के साथ अपेक्षाकृत औपचारिक संबंधों का पता चलता है, इसके विपरीत उन्होंने खुले दिल से इंदिरा और संजय गांधी की तारीफ के पुल बांधे हैं और दोनों की ठकुरसुहाती भी की है।

हमेशा नपे-तुले शब्दों में बात करने वाले श्री मुखर्जी, जो आगे चलकर भारतीय गणराज्य के राष्ट्रपति बने और जिन्हें भारत रत्न से नवाजा गया, ने राजीव गांधी के बारे में हमेशा चौकस होकर बातें की हैं। वह लिखते हैं, “यह सच है कि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता। राजीव की इस बात के लिए आलोचना होती रही है कि वह कुछ करीबी दोस्तों और सलाहकारों पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहे, जिन्होंने तथाकथित ‘बाबालोग’ की सरकार बनाई। उनमें से कुछ लोग अपनी किस्मत संवारने वाले निकले।“

राजीव के साथ उनके असहज रिश्तों से शायद यह स्पष्ट हो जाता है कि सोनिया ने केंद्रीय गृह-मंत्री या प्रधानमंत्री पद के लिए उनके नाम पर विचार करने हेतु कभी पूरी तरह से भरोसा क्यों नहीं किया। जबकि 10, जनपथ के भेदिए हमेशा इस बात पर जोर देते आए हैं कि सोनिया के मन में श्री मुखर्जी के प्रति बड़ा सम्मान था और वह उनकी राय की बड़ी कद्र करती थीं. सन्‌ 1998 में कांग्रेस की कमान संभालने के बाद सोनिया यह जानकर परेशान हो गई थीं कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासन द्वारा जस्टिस एम.एन. वेंकटचलैया की अगुवाई में गठित संविधान समीक्षा पैनल के समक्ष पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने लिखित में कुछ दिया है, और उन्हें यह भी पता लगा कि पैनल में उस जमाने के एक जाने-माने सोनिया विरोधी शामिल हैं, जिनका नाम था- पी. ए. संगमा. ‘धोखाधड़ी’ की आशंका और भय के चलते कांग्रेस ने इस पैनल की बैठकों का बहिष्कार करने का निर्णय लिया था.

इसलिए जब सोनिया ने जाना कि राव ने पैनल के समक्ष कोई सबमीशन दिया है, तो वह खफा हो गईं. इस पर भी राव के खिलाफ कोई बयान जारी करने के बजाए सोनिया ने श्री मुखर्जी का रुख किया और इस वरिष्ठ नेता को राव का मूड भांपने के लिए रवाना किया. भारतीय राजनीति के चाणक्य ने श्री मुखर्जी को बताया था कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है. वह सिक्किम का परिग्रहण किए जाने के संदर्भ में इंदिरा गांधी को बरी कराने गए थे. जाहिर तौर पर राव ने पैनल से कहा था कि सिक्किम को एक भारतीय राज्य के रूप में शामिल करने के लिए इंदिरा द्वारा उठाए गए कदम को सांवैधानिक प्रावधानों के साथ खिलवाड़ किए जाने की दृष्टि से देखना सिरे से गलत है. सोनिया ने फौरन राव को क्लीन चिट दे दी और कहा कि वह राव को हमेशा ऊंची निगाह से देखती आई हैं और उनकी सासू मां भी राव को बड़ा सम्मान देती थीं.

अपनी आत्मकथा में श्री मुखर्जी ने उस घटना को याद किया है, जो 1984 के आम चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन करने वाले कांग्रेस संसदीय बोर्ड की बैठक के दौरान घटी थी. वह लिखते हैं- “निवर्तमान लोकसभा सदस्यों- मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा सीट से कमल नाथ और राजस्थान की चितौड़गढ़ सीट से प्रोफेसर निर्मला कुमारी के नामांकन का अरुण नेहरू समेत राजीव के कुछ करीबी लोगों ने विरोध किया था. मैंने कड़ा ऐतराज जताया और उनका नामांकन किए जाने पर अड़ गया. मेरे विरोध की तीव्रता देख कर शायद राजीव नाखुश हो गए और बार-बार कह रहे थे, ‘इसे अध्यक्ष के विचार के लिए छोड़ दीजिए’मतलब खुद के लिए.”

संजय गांधी की मृत्यु के बाद मुखर्जी ने कहा था कि तब ‘राजीव लाओ’ की एक मुहिम छिड़ गई थी लेकिन खुद उन्होंने सक्रिय रूप से इसमें हिस्सा नहीं लिया. “मैंने यह रवैया अख्तियार किया था कि राजीव का हार्दिक स्वागत है लेकिन इसका फैसला आखिरकार उनको ही करना है.” यह आकलन था श्री मुखर्जी का.

इसके बाद मुखर्जी यह संकेत देने के लिए कि उन्हें कांग्रेस से क्यों निकाला गया था, मई 1986 में टी.एन. निनान द्वारा लिए गए राजीव गांधी के इंटरव्यू का उद्धरण पेश करते हैं. उन्होंने राजीव को यह कहते हुए उद्धृत किया है, “मुझे लगा कि कुछ लोग सामान्य... सीमाओं को लांघे चले जा रहे थे.... मैं क्या कहूं... पार्टी की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की चौहद्दी के भीतर कार्रवाई की स्वतंत्रता, खासकर जबकि पार्टी में चुनाव होने वाले हैं, ताकि हर तरह की भावनाएं चुनाव-प्रक्रिया में जाहिर की जा सकें. तो हमने कुछ कार्रवाइयां की हैं.”

श्री मुखर्जी ने भी इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के संपादक प्रितीश नंदी को अप्रैल 1986 में एक इंटरव्यू दिया था. इस पत्रिका ने ‘द मैन हू न्यू टू मच’ शीर्षक से बारह पन्नों की एक स्टोरी प्रकाशित की, जिसने राजनीतिक हलकों में हंगामा मचा दिया! इस रिपोर्ट से यह ध्वनित होता था कि मुखर्जी साहब कुछ ऐसा जानते हैं, जिससे पार्टी को नुकसान हो सकता है.

मुखर्जी राजीव से निनान की पूछताछ का शब्दशः हवाला देते हैं:

टीएनएन: क्या प्रणब अपनी ताकत को असलियत से ज्यादा आंक रहे थे, इसलिए गच्चा खा गए, क्योंकि वे बिना किसी वास्तविक जनाधार के महत्वपूर्ण बने हुए थे? ऐसे में अगर आप उन्हें ठिकाने लगाते हैं, तो चौतरफा संदेश जाता है?

राजीव: हमने चार या पांच ऐसे लोगों को चुना, जो हमें लगता था कि... बना रहे थे, पार्टी को अस्थिर करने की कोशिश कर रहे थे... जो पार्टी की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की सीमाओं से परे जा रहे थे. और हमने कार्रवाई की. इससे आगे... इसमें किसी प्रकार का... और कोई मोटीवेशन नहीं है. मुखर्जी ने बताया था कि जब 26 अप्रैल 1986 को उन्हें कांग्रेस से निकाला गया तो पार्टी नेतृत्व में से किसी ने उनको सूचित करने की जहमत तक नहीं उठाई.

संजय के बारे में बात करें तो श्री मुखर्जी ने उनके ऊपर प्रशंसा के फूल बरसाए हैं और मीडिया रपटों के उन उद्धरणों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया है, जिनमें संजय की छवि को निखारा गया है. “संजय के फैसलों के पीछे छिपे इरादों पर कोई उंगली नहीं उठा सकता- चाहे वे जनसंख्या नियंत्रण विषयक फैसले हों या निरक्षरता दूर करने और वनरोपण से जुड़े कदम हों. उनके विचार नेक थे और सकारात्मक बदलाव लाना इन सभी का लक्ष्य था. और एक ऐसा व्यक्ति होने के नाते, जो उनको भली-भांति जानता था तथा उनके राजनीतिक जीवन में छह साल उनके साथ काम कर चुका था, मैं उनके अनेक सकारात्मक गुणों का रहस्य जानता था...”

यह महज एक संयोग हो सकता है कि जब तत्कालीन उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी के हाथों श्री मुखर्जी के संस्मरणों का लोकार्पण हुआ तो सोनिया, राहुल, डॉ. मनमोहन सिंह और पार्टी के अन्य प्रभावशाली नेता नदारद रहे. पार्टी की तरफ से डॉ. करण सिंह और पी.जे. कुरियन ही वहां मौजूद थे. मुखर्जी के संस्मरणों का तीसरा हिस्सा “कोयलीशन इयर्स 1996-2012” (रूपा पब्लिकेशंस) एक दिलचस्प स्मरण था और देश की राजनीति, खासकर यूपीए कार्यकाल की राजनीति का एक प्रामाणिक आख्यान था. हालांकि अधिकतर आत्मकथात्मक वर्णनों की तरह घटनाओं और व्यक्तित्वों के बारे में मुखर्जी का वृतांत-विवरण आत्मपरक था और बहुधा उसमें सटीक चित्रण का अभाव दिखता है.

मिसाल के तौर पर, मई 2004 के दौरान मनमोहन सरकार में शामिल होने को लेकर उनकी अनिच्छा कोई आफ्टरथॉट लगती है. 17 मई 2004 की शाम के आसपास जब सोनिया गांधी ने यूपीए का प्रधानमंत्री पद ठुकरा दिया था और मनमोहन को इस पद के लिए नामित कर दिया गया था, उस वक्त तक यह अहम जानकारी गायब थी. वास्तव में मुखर्जी उस समय मल्टी-टास्किंग में जुटे थे- सबसे पहले उन्होंने सोनिया को 2004 के जनादेश का ‘मान’ रखने के लिए मनाया, उसके बाद गठबंधन के भागीदारों को यूपीए में जुटाया, वामपंथी दलों के साथ गठजोड़ मजबूत किया और कई मसौदे तैयार किए, जिनमें राष्ट्रपति भवन से लेकर सहयोगी दलों को लिखे गए पत्र शामिल थे. इसके साथ-साथ वह सोनिया गांधी द्वारा सेंट्रल हॉल में दिए जाने वाले भाषण के लिए सामग्री भी उपलब्ध करा रहे थे. यह सारा काम वह निर्लिप्त भाव से कांग्रेस के किसी अनुभवी प्रबंधक की भांति बेहद कुशल ढंग से अंजाम दे रहे थे. यह याद करने लायक है कि मुखर्जी ने 1991 में उस वक्त इसी प्रकार कर्तव्य का निर्वहन किया था जब पी वी नरसिम्हा राव को शपथ दिलाई जा रही थी. किंवदंती यह है कि श्री मुखर्जी ने राव के हितसाधक संभावित मंत्रियों की एक सूची भी तैयार की थी. हालांकि जब अंतिम सूची सामने आई तो पद और गोपनीयता की शपथ लेने वाले मंत्रियों की विशाल फौज में से मुखर्जी का नाम गायब था!

एक अंदरूनी सूत्र होने के नाते मुखर्जी को इस ग्रांड ओल्ड पार्टी की ढेर सारी सूचनाओं, गतिविधियों और घटनाक्रमों के राज मालूम थे. सन्‌ 1991 में जब वाजपेयी सरकार मात्र एक वोट से गिर गई और एक वैकल्पिक सरकार बनाने की नाकाम कोशिश हुई, तो रिजर्व बेंच में सोनिया ने मनमोहन को बिठा रखा था. उनका यह रुख मुखर्जी से कहीं ज्यादा दो लोगों को बेहद नागवार गुजरा. माधवराव सिंधिया ने सबसे ज्यादा बुरा माना. 10 जनपथ ने उनकी प्रशासनिक सूझबूझ, निजी करिश्मे और राजीव गांधी व सोनिया से उनकी करीबी को बुरी तरह नजरअंदाज कर दिया था. दूसरी दुखी आत्मा थे अर्जुन सिंह, जो लोकप्रिय अवधारणा में एक स्वतंत्र विचारों वाले व्यक्ति थे, लेकिन सोनिया के ऐसे वफादार थे जिन्होंने राव के विरुद्ध सोनिया का प्रछन्न युद्ध लड़ते हुए वैसे भी अपने परवान चढ़ रहे राजनीतिक कैरियर को होम कर दिया था. एक अनुभवी और कुशल योद्धा होने के नाते मुखर्जी को समझ जाना चाहिए था कि जब सोनिया ने सिंधिया और अर्जुन का पत्ता काट दिया है, तो उनके रोशनी में आने के अवसर शून्य ही थे.

यह जानना प्राथमिक स्तर की बात थी कि 2004 में मुखर्जी और अर्जुन सिंह पर मनमोहन को तरजीह क्यों दी गई (उस वक्त तक सिंधिया की मृत्यु हो चुकी थी). पी वी नरसिम्हा राव वाला प्रयोग करने के बाद 10 जनपथ एक गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने के लिए अपने राजनेताओं में से किसी राजनेता की कांग्रेस के प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्ति को लेकर सावधान था. यद्यपि सोनिया आधिकारिक रूप से राजनीति में नहीं थीं और राजीव गांधी की हत्या के बाद राव को कांग्रेस अध्यक्ष व प्रधानमंत्री बनाए जाने में उनका कोई हाथ नहीं था, लेकिन वह राव और उनकी टीम द्वारा चली गई चालों के बारे में अनभिज्ञ नहीं थीं. इनमें धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के मूल सिद्धांतों के साथ की गई छेड़छाड़, सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी व सत्यनिष्ठा तथा कांग्रेस संगठन को संभालने के नाम पर किए गए खेल शामिल थे. वह यूपीए के कार्यकाल पर उस दौर का कोई साया नहीं पड़ने देना चाहती थीं. उस अर्थ में प्रधानमंत्री की कुर्सी से वंचित रखना मुखर्जी की कोई नुक्ताचीनी नहीं थी, बल्कि राजनीतिक वर्ग को लेकर सोनिया का आम संदेह प्रतिबिम्बित हो रहा था.

दूसरी तरफ मनमोहन असाधारण और इसका अपवाद साबित हुए. दस वर्षों की लंबी अवधि में प्रधानमंत्री ने चहेतों की कोई भी मंडली बनने-बनाने से परहेज किया. उन्होंने जालंधर से लोकसभा चुनाव लड़ने के सुझाव पर विचार तक नहीं किया, जबकि बादल परिवार और अकाली उनका अनौपचारिक ढंग से समर्थन करने को तैयार बैठे थे. बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन ने मंत्रियों की नियुक्ति और उनकी हकालपट्टी कर्तव्यनिष्ठा निभाते हुए की, और इस तथ्य का मान रखा कि राजनीतिक बागडोर सोनिया के हाथों में है. वह वोट जुटाने वाली और कांग्रेस की नेता थीं. आपके मन में इस तरह के रवैए के प्रति तिरस्कार की भावना हो सकती है, लेकिन तब ऐसा ही चल रहा था.

चंद बातें दूसरे चरण में तृणमूल को यूपीए से बाहर का रास्ता दिखाए जाने पर मुखर्जी द्वारा किए गए विलाप और दुख जताने को लेकर. यह याद रखा जाना चाहिए कि 1990 के दौरान कांग्रेस से भगाने समेत ममता से जुड़ी पूरी दास्तान में कई किरदार और अनेक प्रकार के तत्व शामिल हैं. सबको पता है कि ममता को कांग्रेस से बाहर निकालने के लिए किस तरह सोमेन मित्रा तथा उनके जैसे अन्य लोगों को उगाया और चढ़ाया गया था. आगे चलकर मुखर्जी और ममता ने शांति स्थापित कर ली होगी, लेकिन इतिहास और घटनानुक्रम को किसी की सुविधानुसार बदला नहीं जा सकता.

नोट- लेखक और पत्रकार रशीद किदवई ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के विजिटिंग फेलो हैं. वह सरकार और राजनीति पर नजर रखते हैं तथा कांग्रेस पार्टी के मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं.

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