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वर्तमान किसान आंदोलन और हमारे गांव का किसान?

बीते कई दशकों में धान और गेहूं की खरीद अधिकांश राज्यों में सुनिश्चित तरीके से नहीं हो पायी है, बाकी और अनाजों को खरीदना सरकारी मंडियों के लिए अब तक असंभव रहा है.

वर्ष 2020 न केवल भारतीय बल्कि पूरे दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए एक कठिन वर्ष रहा है, जिससे विकास की गति धीमी नहीं बल्कि उलटी दिशा में है. कोरोना ने भारतीय और विश्व अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है. आज जब कोरोना काल में अर्थव्यवस्था टूट चुकी है, हर ओर निराशा फैली हुई है, कॉर्पोरेट और सर्विस सेक्टर चरमराया हुआ है, ऐसे में देश के किसानों ने ही आगे बढ़ कर आशा की किरण दिखाई, लॉकडाउन के दौरान देश में यही किसान अन्नदाता के रूप में दिखे, सरकार के माध्यम से हर किसी के लिए भोजन उपलब्ध कराया. मुद्दा चाहे कुछ भी हो, आज यही अन्नदाता ठिठुरती सर्दियों में खुले आसमान के नीचे सड़क पर लेटने को मजबूर हैं. कई किसान संगठन नए कृषि कानून का विरोध कर रहें हैं.

कृषि शुरू से ही मानव सभ्यता का हिस्सा रही है और आपस में किसानों के बीच पारस्परिक संबंधों से भरी है. खेती मौसम के अनुसार की जाती है. देश की जनता को खिलाने के लिए अनाजों का उत्पादन करने में सक्षम होना किसानों के लिए महत्वपूर्ण विषय रहा है. दशकों से, किसानों ने कृषि के माध्यम से सभी के लिए भोजन का ज्यादा से ज्यादा उत्पादन किया है.

मेरा गांव अंटौर, जो कि जिला दरभंगा से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर है, जिसकी आबादी चार हजार के करीब होगी और इसमें तक़रीबन 2200 मतदाता हैं. पूर्व में गांव की राजनीतिक शून्यता के कारण अंटौर पंचायत को भंग कर इसे बेनीपुर प्रखंड (जो कि 3  कि.मी होगा) से हटाकर अलीनगर (जो कि 15 कि.मी, उलटी दिशा में है) में मोतीपुर पंचायत का सृजन कर इसमें जोड़ दिया गया है. यहां के अधिकांश नौजवान नौकरी के सिलसिले में शहरों में ही रहते हैं. हर्ष की बात यह है कि बीते कुछ सालों में नए विकल्प तलाशने कुछ लोग वापस गांव भी आएं हैं. हर परिवार के कुछ सदस्य कृषि कार्य में लगे हुए हैं, और उनका जीवन यापन इसी से होता आया है. यहां के प्रमुख उत्पाद धान, रबी, आम, मखान और मत्स्यपालन है.

बीते कुछ वर्षों में किसानों की हालत में सुधार ज़रूर हुआ है. इसके कारण हैं अच्छी सड़कें, 24 घंटे बिजली, किसान अनुदान की राशि, कृषि ऋण, फसल बीमा और इस तरह की अन्य सरकारी योजनाएं. इनकी वर्तमान समस्याएं आज होने वाली किसान आंदोलन से भिन्न है. जैसे कि, गांव में जल निकासी की समस्या, बच्चों के खेलने के लिया मैदान, लाइब्रेरी, अच्छी शिक्षा व्यवस्था, कृषि में नई तकनीक की जागरूकता, इत्यादि. सबसे बड़ी समस्या स्वास्थ्य को लेकर है. अंटौर में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र की बिल्डिंग बीते कई साल में तैयार होकर बंद पड़ी है और यहां के आसपास के गावों की स्वास्थ्य व्यवस्था दयनीय है. जैसे कि नवादा, मोतीपुर, रमौली, बलहा, लक्ष्मणपूर गरहा, धेरुख़, बेलौन, मकरमपुर, अंदौली, जघट्टा, सझुआर, मझौरा, चौगमा, पोहद्दी, महिनाम इत्यादि गांव हैं जिनकी भिन्न-भिन्न समस्याएं है. अंटौर का एक भी किसान, वर्तमान किसान आंदोलन में सम्मिलित नहीं है. यहां तक की अधिकांश किसानों को फसलों की एमएसपी के बारे में पता भी नहीं है.

उतर भारत में स्कूलों के बच्चों को सर्दियों की छुट्टियों का इंतजार रहता है. इन छुटियों में सबकी अपनी प्लानिंग होती है, और हमारी उत्सुकता अपने गांव अंटौर जाने की होती थी. सर्दियों के मौसम में ही धान और गन्ने की फसल की कटाई होती है. मेरे दादा जी स्वर्गीय श्री दीना नाथ झा (नागा जी), एक कुशल किसान थे. अपने गांव के खेतों में दादा जी के साथ धान की कटाई करने जाना और कटाई के बाद बचे हुए धान के शीश को चुनना और उसका लोरहा बनाकर, इसके बदले लाई और मुरही खेत के पास ही बदलना. बैलगाड़ी पर लदे हुए धान के ऊपर चढ़, रस्से को जोर से पकड़ कर वापस जाने का आनंद कोई साहसिक गतिविधी से कम न था. उबड़-खाबड़ रास्ते होने के बावजूद भी भोलू की कुशलता और बैलों के आपसी तालमेल से ही वापस घर बिना बैलगाड़ी से गिरे पहुंचना संभव होता था. यह आनंद किसी भी हिल-स्टेशन से बेहतर था.

उन दिनों किसान की दिनचर्या देख कर यही लगता था की कृषि एक जीवनशैली है. हमारे यहाँ की मिट्टी देश की सबसे उर्वरक मिट्टी में से एक है, मगर इसके बावजूद भी यहां के किसानों की आय सबसे कम होती है. मैनुअल कटाई देश भर में आम है. धान बोआई, कटाई, ढोआई, सफाई, इत्यादि से मालूम हुआ की खेती लेबर इंटेंसिव कम है और लागत भी अधिक है. इतनी मेहनत और इतनी लागत के बाद अगर इन मंडियों पर किसी तीसरे का वर्चस्व हो तो कृषि किसानों के लिए फायदेमंद नहीं हो सकती है और कृषि किसानों की जीवनशैली ज्यादा दिन तक रहना नामुमकिन है.

कृषि में बिचौलिओं/एजेंट्स/ट्रेडर्स की वर्चस्व वाली प्रणाली, जो किसानों को साल दर साल उनके फ़सलों पर बाजारों में कब्ज़ा कर के बैठी है, इससे किसानों का न केवल आर्थिक नुकसान होता आया है, बल्कि कई कारणों से उनके खेतों की मिट्टी भी प्रभावित होती रही है. बीते कुछ दशकों में अधिकतर छोटे किसान खेती छोड़, शहर में चाकरी करने को मजबूर हुए. बड़े किसान कुछ अलग विकल्प ढूंढने को मजबूर हुए.

बीते कई दशकों में धान और गेहूं की खरीद अधिकांश राज्यों में सुनिश्चित तरीके से नहीं हो पायी है, बाकी और अनाजों को खरीदना सरकारी मंडियों के लिए अब तक असंभव रहा है. केवल धान और गेहूं की खरीद पंजाब / हरियाणा में सुनिश्चित तरीके से की जाती है और अधिकांश अन्य राज्यों में इन दोनों फ़सलों की खरीद पर एमएसपी से बहुत कम दर मिलता है. यहां तक कि दूसरे राज्यों की उपज भी इन दोनों राज्यों में बेहतर कीमत पाने के लिए, यहां की मंडियों में अन्य राज्यों के बिचौलियों/छोटे ट्रेडर्स के द्वारा लाई जाती है और ये आवश्यक नहीं है की, धान और गेहूं की अच्छे दाम मिलने से इन राज्यों के किसानों की हालत बहुत अच्छी होगी. इन दोनों राज्यों में ट्रेडर्स व कमीशन एजेंट की हालत वहां के किसानों से बेहतर है.

इन दोनों राज्यों में भी धान और गेहूं के अलावा, किसी अन्य फसल पर एमएसपी के हिसाब से दाम नहीं मिलता है. इसका कारण स्टेट में अन्य फ़सलों के प्रोक्यूर्मेंट का अभाव है. इन दोनों राज्यों में फसल विविधता महत्वपूर्ण होनी चाहिए थी, अन्यथा मिट्टी की सेहत इतनी तेजी से बिगड़ रही है कि निकट भविष्य में फ़र्टिलाइज़र की अधिक खुराक भी मददगार नहीं होगी. पंजाब सरकार फ़सलों में विविधता लाने के लिए कोई भी प्रयास नहीं कर रही है. हरियाणा सरकार द्वारा फसल विविधीकरण के लिए कुछ प्रयास किए गए हैं, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है.

कृषि में, स्थिरता एक जटिल समस्या बनी हुई है, जिसमें किसान के आर्थिक हालत सबसे महत्वपूर्ण है. अगर कृषि को स्थायी बनाना है तो इसे जीवनशैली छोड़, व्यवसाय की दृष्टिकोण से देखना होगा और किसान को अपनी फसल के लिए खुद ही सही ग्राहक ढूंढने होंगे, तभी कृषि देश का एक मजबूत अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन सकती है.

विभिन्न प्रकार की फ़सलों को लगाने से कई फायदे हो सकते हैं, स्वास्थ्यवर्धक मिट्टी, इंटरक्रॉपिंग और बेहतर कीट नियंत्रण, फसल विविधता, एक ही खेत में अलग-अलग फ़सलों को लगाना, इससे इनकी आय में वृद्धि होगी. इन विषयों पर किसान को प्रशिक्षण देने के तरीके को सुदृढ़ करना होगा.

आज भी राजनीतिक पार्टियां, कृषि नीति को उर्वरक, बिजली, खाद्य सुरक्षा, लोन, मंडी और सब्सिडी इत्यादि पर ही आधारित रखती है. हालांकि पूर्व में इन सभी नीतियों से उत्साहजनक संकेत ज़रुर मिले हैं, लेकिन अगर हम भारत में स्थाई खेती का बेहतर मॉडल बनाना चाहते हैं, तो हमें इन नीतियों से आगे की सोचने की जरूरत है.

नया बिल रद्द करना समाधान नहीं है. उपज और खरीद में सुधार की आवश्यकता है, साथ में नई तकनीक को लेकर जागरूकता भी लानी होगी. अगर यह केवल एक सरकारी एजेंसी द्वारा संभव है, तो यह विचार का विषय है? भविष्य में किसानों को व्यापारी की भूमिका भी निभानी होगी, तभी इनकी हालत में सुधार होगा, और आय में वृद्धि होगी. ये तभी मुमकिन है, जब किसान के पास पुरानी मंडी के अलावा और भी कुछ नए विकल्प होंगे, जिससे इनके जीवन को एक नया आयाम मिलेगा.

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नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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