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पीएम मोदी आखिर क्यों चाहते हैं दोबारा उद्धव ठाकरे का साथ?

बताते हैं कि अपने पुराने सहयोगी उद्धव ठाकरे को साथ जोड़ने के लिए कुछ ऐसे ही गेम प्लान को अंजाम देने की तैयारी पर गंभीरता से काम हो रहा है, लेकिन सवाल ये है कि मोदी-शाह की जोड़ी उद्धव को साथ लाने के लिये इतनी उतावली क्यों है? महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटें हैं और पीएम मोदी वहां की सियासत की इस जमीनी हकीकत से वाकिफ़ हैं कि एकनाथ शिंदे गुट के अलग हो जाने के बावजूद उद्धव गुट वाली शिवसेना का जलवा बरकरार है. लिहाजा, चुनाव से पहले बीजेपी-शिवसेना का गठबंधन हो गया, तो उम्मीद से ज्यादा सीटों पर भगवा परचम लहराने में आसानी होगी और पीएम के रूप में लगातार अपना तीसरा और ऐतिहासिक कार्यकाल हासिल करने में भी कोई अड़चन नहीं आयेगी.

हालांकि महाराष्ट्र में अलग-अलग दलों के प्रमुख नेता इस बात पर आम राय रखते हैं कि पीएम मोदी के उद्धव ठाकरे और एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार से गर्मजोशी भरे निजी रिश्ते हैं, जो एकतरफा नहीं हैं यानी वे दोनों नेता भी इस रिश्ते की गहराई को समझते हैं. राजनीति की समझ रखने वाले विश्लेषकों ने अगर गौर किया हो तो एनडीए से अलग होने और सरकार गिरने के बाद उद्धव ठाकरे के निशाने पर देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे तो रहे हैं, लेकिन उन्होंने इसका खास ख्याल रखा कि उनका कोई भी बयान पीएम मोदी पर सीधा हमला करने वाला न हो.

वैसे तो उद्धव के लिए शरद पवार भी "ट्रबल शूटर" रहे हैं, जिन्होंने महा विकास अघाड़ी का गठबंधन करके सरकार बनाने का जादू कर दिखाया था जिसकी तब किसी को उम्मीद भी नहीं थी. बता दें कि एनसीपी और कांग्रेस ने शिवसेना के साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाई थी, जो एकनाथ शिंदे गुट की बगावत के बाद पिछले साल जून में गिर गई और फिर बीजेपी के समर्थन से शिंदे प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गये. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि भगत सिंह कोश्यारी को महाराष्ट्र के राज्यपाल पद से हटाने की बड़ी वजह तो उनके विवादास्पद बयान ही बने, लेकिन एक वजह ये भी थी कि केंद्र नहीं चाहता था कि सेना के साथ उसके रिश्तों में कोई स्पीड ब्रेकर बनने की भूमिका निभाने लगे.

उधर, कांग्रेस में मची आंतरिक कलह ने भी महा विकास अघाड़ी के दोनों सहयोगी दलों को चिंता में डाल दिया है क्योंकि बृहन मुंबई नगर निगम यानी BMC के चुनाव की तारीख का जल्द ही होने वाला है. वह देश की सबसे अमीर नगर निगम है, जिसका सालाना बजट 40 हजार करोड़ रुपये का है. फिलहाल उस पर उद्धव गुट वाली शिवसेना का कब्जा है और बीजेपी सदन में दूसरे नंबर पर है. जाहिर है कि उद्धव गुट अपना कब्जा बरकरार रखने के लिए जमीन-आसमान एक कर देगा. बीएमसी की सत्ता से ही शिवसेना को फंड मिलता है, इसलिये उद्धव ठाकरे भूलकर भी ऐसी कोई गलती नहीं करेंगे कि दशकों पुराने इस गढ़ से वे अपना कब्जा खो बैठें.

दरअसल, उद्धव गुट की सेना को बीजेपी में लाने की मोदी की इच्छा को देवेंद्र फडणवीस की महत्वाकांक्षा पर ब्रेक लगाने से भी जोड़कर देखा जा रहा है. ढाई साल तक सीएम की कुर्सी का स्वाद चख चुके फडणवीस फिलहाल डिप्टी सीएम हैं. बताते हैं कि वे दोबारा सीएम बनने के लिए बेताब हैं और उन्होंने पार्टी आलाकमान को फार्मूला सुझाया है कि एकनाथ शिंदे गुट वाली सेना का महाराष्ट्र बीजेपी में विलय कर दिया जाये और यही दोनों गुटों के अलग होने का तार्किक परिमाण है. हाल ही में पार्टी नेताओं ने भी खुलकर आवाज उठाई थी कि फडणवीस को ही सीएम होना चाहिये. शिंदे इससे बेहद नाखुश हैं और बताते हैं कि दोनों के रिश्तों की खटास भी अब बढ़ने लगी है.

बता दें कि मोदी-शाह के फरमान के बाद ही फडणवीस ने शिंदे की अगुवाई वाली सरकार में डिप्टी सीएम बनना मंजूर किया था. मकसद ये था कि गठबंधन सरकार अस्थिर न हो पाए, लेकिन लगता है कि आठ महीने बाद ही अस्थिरता के बादल मंडराने लगे हैं. फडणवीस को वित्त, गृह व कानून जैसे तमाम अहम मंत्रालयों में किनारे लगाने की शुरुआत हो चुकी है. बीते दिनों मुंबई की जनता को इस सरकार की ऐसी हास्यास्पद स्थिति देखने को मिली, जब शहर में दो पुलिस कमिश्नर नियुक्त कर दिए गए. एक की नियुकित सीएम ने तो दूसरे की नियुक्ति डिप्टी सीएम ने कर दी थी.

गौरतलब है कि आरएसएस के मुख्यालय वाला नागपुर ही फडणवीस का गृह जिला है. बीते दिनों वहां हुए विधान परिषद के चुनाव में बीजेपी को पांच में से महज एक सीट पर ही जीत मिली जबकि महा विकास अघाड़ी ने तीन सीटें जीतकर संघ व बीजेपी को शर्मिंदा होने पर मजबूर कर दिया. एक सीट पर निर्दलीय ने कब्जा किया.

इन नतीजों के बाद बीजेपी में फडणवीस विरोधियों ने खुलकर कहना शुरू कर दिया कि अगर पार्टी को भविष्य में ऐसी ही शर्मिंदगी झेलने से बचाना है, तो उनसे कहा जाये कि वे सरकार में जोड़तोड़ वाली राजनीति करने के बजाय पहले अपने घर को संभालें. बताते हैं कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी फडणवीस के इस हाई प्रोफाइल स्टाइल से खुश नहीं है और उन्हें हैसियत का अहसास कराना चाहता है. इसलिये उद्धव ठाकरे से हाथ मिलाकर बीजेपी उनके दोबारा सीएम बनने के ख्वाब को भी पूरा होने देने के मूड में नहीं है. 

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